आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्यवस्था दी है कि यदि अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए प्रासंगिक तर्कों पर न्यायालय विचार नहीं करता है, तो यह “रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि” (Error Apparent on the Face of the Record) माना जाएगा।
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने कहा कि यदि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तर्क न्यायालय के समक्ष रखे गए और फैसले में दर्ज भी किए गए, लेकिन उन पर कोई निर्णय नहीं दिया गया, तो यह पुनर्विचार (Review) के अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का एक वैध आधार है। इसके साथ ही, कोर्ट ने अपील A.S. No. 59 of 2020 को उसके मूल नंबर पर बहाल कर दिया है ताकि गुण-दोष के आधार पर नया निर्णय लिया जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद मूल रूप से एक बंधक (Mortgage) मुकदमे (O.S. No. 98 of 2010) से जुड़ा है, जो प्रतिवादी (ब्यसानी सतीश और अन्य) द्वारा दायर किया गया था। इस मुकदमे में अंतिम डिक्री पारित होने के बाद, संपत्ति की बिक्री के लिए निष्पादन याचिका (E.P. No. 50 of 2013) दायर की गई थी।
पुनर्विचार याचिकाकर्ता, पल्ला चेंचू हरिकला ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 21 नियम 58 के तहत एक दावा याचिका (E.A. No. 32 of 2017) दायर की। उनका तर्क था कि वह दिवंगत अर्जुनैया (उर्फ चेंचैया) की बेटी हैं, जिनका वर्ष 2000 में बिना वसीयत किए निधन हो गया था। उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत संपत्ति में 1/4 हिस्से का दावा किया और कहा कि निर्णय देनदारों (Judgment Debtors) ने उनकी सहमति के बिना संपत्ति गिरवी रख दी थी। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने विभाजन के लिए एक अलग मुकदमे (O.S. No. 199 of 2009) में पहले ही डिक्री प्राप्त कर ली है।
निचली अदालत (Executing Court) ने उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह पोषणीय (Maintainable) नहीं है, क्योंकि उन्होंने बंधक विलेख (Mortgage Deed) को चुनौती नहीं दी थी और न ही अपने विभाजन के मुकदमे में डिक्री-धारकों को पक्षकार बनाया था।
इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील (A.S. No. 59 of 2020) की, जिसे 5 जनवरी, 2022 को खारिज कर दिया गया। अपीलीय अदालत ने उस समय माना था कि आदेश 21 नियम 58 केवल कुर्क (Attached) की गई संपत्तियों से संबंधित है, और चूंकि यह मामला बिना कुर्की के बंधक डिक्री का था, इसलिए अपील में कोई दम नहीं है।
पुनर्विचार के लिए तर्क
याचिकाकर्ता ने 5 जनवरी, 2022 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के वकील, श्री एम.आर.के. चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि अपीलीय फैसले में कानून की स्पष्ट त्रुटि है। उन्होंने कहा कि अपील के दौरान विशिष्ट तर्क उठाए गए थे, जैसे कि याचिकाकर्ता बंधक विलेख में पक्षकार नहीं थी, इसलिए उसे चुनौती देने की आवश्यकता नहीं थी। इन तर्कों को फैसले में दर्ज तो किया गया, लेकिन उन पर कोई निर्णय नहीं दिया गया।
यह भी तर्क दिया गया कि अपीलीय अदालत ने इस बात पर विचार नहीं किया कि भले ही गलत प्रावधान (आदेश 21 नियम 58) का उल्लेख किया गया हो, फिर भी दावा आदेश 21 नियम 101 CPC के तहत सुनवाई योग्य था, जो निष्पादन अदालत को अधिकार, शीर्षक और हित से संबंधित सभी प्रश्नों को निर्धारित करने का आदेश देता है।
प्रतिवादियों के वकील, श्री सी. सुबोध ने पुनर्विचार का विरोध करते हुए कहा कि अपील का फैसला गुण-दोष के आधार पर किया गया था और पुनर्विचार को “छिपी हुई अपील” (Appeal in Disguise) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
खंडपीठ ने पुनर्विचार के दायरे की जांच करते हुए CPC की धारा 114 और आदेश 47 नियम 1 का संदर्भ लिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, विशेष रूप से हरि विष्णु कामत बनाम सैयद अहमद इसाक और मोरान मार बसेलिओस कैथोलिकोस बनाम मार पॉलोस एथानैसियस का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि “रिकॉर्ड पर स्पष्ट गलती या त्रुटि” होने पर पुनर्विचार स्वीकार्य है।
हाईकोर्ट ने पाया कि पिछले अपीलीय फैसले में याचिकाकर्ता के विशिष्ट आधारों को स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड किया गया था। इसमें यह तर्क शामिल था कि:
“अपीलकर्ता, जो ई.पी. शेड्यूल संपत्ति में अपने वैध हिस्से के स्वतंत्र अधिकार का दावा कर रही है, दावा याचिका बनाए रख सकती है और कानून के गलत प्रावधान (आदेश XXI नियम 58) का केवल उल्लेख करने से अपीलकर्ता दावा याचिका बनाए रखने के लिए अयोग्य नहीं होगी, भले ही डिक्री एक बंधक डिक्री हो।”
हालांकि, पीठ ने नोट किया कि इन तर्कों को दर्ज करने के बावजूद, अदालत ने न तो इन्हें संबोधित किया और न ही इनका कोई समाधान किया।
न्यायमूर्ति तिलहरी ने अपने फैसले में लिखा:
“लेकिन जब कोई मुद्दा उठाया गया, तर्क प्रस्तुत किया गया और फैसले में दर्ज भी किया गया, लेकिन उसे संबोधित नहीं किया गया और उस पर निर्णय नहीं लिया गया, तो हमारा मानना है कि यदि ऐसे मुद्दे या तर्क का मामले से जुड़े मुद्दे पर प्रभाव पड़ता है… तो ऐसे तर्क पर विचार न करना निश्चित रूप से कानून की त्रुटि होगी।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस बात के गुण-दोष में नहीं जा रहा है कि तर्क सही थे या नहीं, बल्कि केवल इस बात पर कि उन पर फैसला न देना एक त्रुटि थी। कोर्ट ने राजेंद्र सिंह बनाम उपराज्यपाल मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी की जाती है, तो न्याय की विफलता को रोकने के लिए पुनर्विचार की शक्ति का विस्तार त्रुटियों को सुधारने तक है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रासंगिक तर्कों पर विचार न करना, जो निष्पादन न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के लिए महत्वपूर्ण थे, रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि का मामला है।
याचिका को स्वीकार करते हुए, कोर्ट ने आदेश दिया:
“परिणामस्वरूप, 2022 की पुनर्विचार याचिका I.A. No.1 को स्वीकार किया जाता है और A.S.No.59 of 2020 में पारित 05.01.2022 के निर्णय और डिक्री को रद्द किया जाता है। अपील को उसके मूल नंबर पर बहाल किया जाता है ताकि गुण-दोष पर नया निर्णय लिया जा सके।”
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: पल्ला चेंचू हरिकला बनाम ब्यसानी सतीश और अन्य
- केस नंबर: Review I. A. No. 1 of 2022 in A. S. No. 59 of 2020
- पीठ: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम

