सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई संपत्ति मुकदमा (Suit) दायर होने से पहले ही किसी तीसरे पक्ष को बेच दी गई है, तो उस संपत्ति पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC), 1908 के आदेश XXXVIII नियम 5 के तहत ‘निर्णय से पूर्व कुर्की’ (Attachment Before Judgment) का आदेश लागू नहीं किया जा सकता है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मूल खरीदार (क्रेता) के कानूनी वारिसों द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति हस्तांतरण को कपटपूर्ण (Fraudulent) साबित करने के लिए संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 (Transfer of Property Act) की धारा 53 के तहत ठोस कार्यवाही की आवश्यकता होती है, और इसे केवल दावा याचिका (Claim Petition) की सरसरी प्रक्रिया के माध्यम से तय नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
यह मामला एक संपत्ति विवाद से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं के पूर्वज, एल.के. प्रभु ने 10 मई 2002 को प्रतिवादी संख्या 3, वी. रामानंदा प्रभु के साथ बिक्री का एक समझौता (Agreement for Sale) किया था। विचारणीय राशि (Consideration) के भुगतान के बाद, 28 जून 2004 को एल.के. प्रभु के पक्ष में एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Registered Sale Deed) निष्पादित किया गया।
इसके बाद, 18 दिसंबर 2004 को पहले प्रतिवादी, के.टी. मैथ्यू ने प्रतिवादियों के खिलाफ पैसे की वसूली के लिए एक मुकदमा (O.S. No. 684 of 2004) दायर किया और निर्णय से पहले संपत्ति की कुर्की की मांग की। ट्रायल कोर्ट ने 13 फरवरी 2005 को कुर्की का आदेश दिया।
एल.के. प्रभु ने CPC के आदेश XXXVIII नियम 8 के तहत संपत्ति को कुर्की से मुक्त करने के लिए एक याचिका दायर की। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने 24 फरवरी 2009 को यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह हस्तांतरण कपटपूर्ण था और संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 53 के तहत अमान्य था। केरल हाईकोर्ट ने 13 फरवरी 2023 के अपने फैसले में दावा याचिका की अस्वीकृति को बरकरार रखा, लेकिन मामले को ट्रायल कोर्ट के पास यह निर्धारित करने के लिए वापस भेज दिया कि खरीदार देनदार से कितनी राशि वसूलने का हकदार है।
कोर्ट में दी गई दलीलें (Arguments)
अपीलकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि ‘निर्णय से पूर्व कुर्की’ का आदेश बनाए रखने योग्य नहीं था क्योंकि मुकदमा दायर होने से लगभग छह महीने पहले ही बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित हो चुका था। हमदा अम्माल बनाम अवदियप्पा पत्थर (1991) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, वकील ने तर्क दिया कि कोर्ट के पास आदेश XXXVIII नियम 5 के तहत उस संपत्ति को कुर्क करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है जो मुकदमा दायर करने के समय प्रतिवादी की नहीं थी।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि CPC के आदेश XXXVIII नियम 8 और आदेश XXI नियम 58 (1976 में संशोधित) के तहत, अधिकार, शीर्षक और हित से संबंधित सभी प्रश्नों का निर्णय निष्पादन कार्यवाही में ही किया जाना चाहिए, न कि अलग मुकदमे में। उन्होंने दावा किया कि यह हस्तांतरण लेनदारों (Creditors) को धोखा देने के इरादे से किया गया था और इसलिए संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 53 के तहत शून्यकरणीय (Voidable) है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
सुप्रीम कोर्ट ने CPC के आदेश XXXVIII नियम 5 से 10 और संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 53 की विस्तृत जांच की।
निर्णय से पूर्व कुर्की का दायरा (Scope of Attachment Before Judgment)
कोर्ट ने कहा कि निर्णय से पहले कुर्की करने की शक्ति वादी की संभावित डिक्री को सुरक्षित करने तक सीमित है, ताकि प्रतिवादी अपनी संपत्ति को खुर्द-बुर्द न कर सके। पीठ ने कहा:
“हालांकि, अनिवार्य शर्त यह है कि जिस संपत्ति को कुर्क किया जाना है, वह मुकदमा दायर करने की तारीख पर प्रतिवादी की होनी चाहिए; जो संपत्ति मुकदमे से पहले ही हस्तांतरित की जा चुकी है, उसे इस प्रावधान के तहत कुर्क नहीं किया जा सकता है।”
कपटपूर्ण हस्तांतरण और प्रक्रिया (Fraudulent Transfers)
कोर्ट ने दावा याचिकाओं की सरसरी प्रकृति और कपटपूर्ण हस्तांतरण साबित करने की ठोस आवश्यकताओं के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा:
“नियम 8 के तहत तंत्र, जो निर्णय से पहले कुर्क की गई संपत्ति में स्वतंत्र अधिकार रखने वाले तीसरे पक्ष के दावेदारों के लिए एक सुरक्षात्मक प्रक्रिया है, को संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम की धारा 53 के तहत मूल जांच में बदलने के लिए विस्तारित नहीं किया जा सकता है।”
पीठ ने यह भी नोट किया कि धोखाधड़ी साबित करने का भार आरोप लगाने वाले पक्ष पर होता है। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश करने में विफल रहे कि हस्तांतरण लेनदारों को हराने या देरी करने के इरादे से किया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया गया है, जैसे कि सामुदायिक संबंध, प्रतिवादी नंबर 2 की वित्तीय कठिनाइयाँ और आंशिक नकद प्रतिफल, संदेह पैदा कर सकते हैं, लेकिन संदेह कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता।”
पूर्व संविदात्मक दायित्व (Prior Contractual Obligations)
वन्नारक्कल कल्लालथिल श्रीधरन बनाम चंद्रमथ बालकृष्णन (1990) मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि बिक्री का समझौता संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा एक दायित्व पैदा करता है।
“कुर्की करने वाले लेनदार के अधिकारों को संलग्न संपत्ति की बिक्री के लिए पूर्व समझौते से उत्पन्न संविदात्मक दायित्व को ओवरराइड (रद्द) करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
निर्णय (Decision)
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चूंकि बिक्री विलेख 28 जून 2004 को निष्पादित किया गया था और मुकदमा बाद में 18 दिसंबर 2004 को दायर किया गया था, इसलिए मुकदमा दायर करने के समय संपत्ति प्रतिवादी की नहीं थी।
“परिणामस्वरूप, 13.02.2005 को आदेशित निर्णय से पूर्व कुर्की कानूनी रूप से उक्त संपत्ति तक विस्तारित नहीं हो सकती थी।”
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और केरल हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और बिक्री विलेख को वैध घोषित करते हुए दावा याचिका को स्वीकार कर लिया।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: एल.के. प्रभु @ एल. कृष्णा प्रभु (मृत) कानूनी वारिसों के माध्यम से बनाम के.टी. मैथ्यू @ थम्पन थॉमस और अन्य
- साइटेशन: 2025 INSC 1364
- कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन

