ओडिशा हाई कोर्ट ने विधायकों-सांसदों को शिक्षकों के तबादले की सिफारिश का अधिकार देने वाला आदेश रद्द किया; कहा– स्कूलों में राजनीतिक दखल “अवांछनीय”

ओडिशा हाई कोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार का वह आदेश रद्द कर दिया जिसमें विधायकों और सांसदों को स्कूल शिक्षकों के तबादले की सिफारिश करने की अनुमति दी गई थी। अदालत ने साफ कहा कि शैक्षणिक परिसरों में राजनीतिक दखल या राजनीतिक निकटता उचित नहीं है और ऐसी व्यवस्था कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।

जस्टिस दिक्षित कृष्ण श्रीपाद 24 शिक्षकों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। राज्य सरकार ने 13 मई को एक परिपत्र जारी कर विधायकों-सांसदों को अपने क्षेत्र के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के 15 “सबसे deserving” तबादला मामलों की सिफारिश करने की अनुमति दी थी। यह एक बार के लिए लागू प्रावधान था, जो केवल चालू शैक्षणिक वर्ष पर लागू होता।

अदालत ने कहा कि स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग ने यह नहीं बताया कि यह परिपत्र किस वैधानिक अधिकार के तहत जारी किया गया। इस वजह से आदेश कानूनी रूप से प्रभावी नहीं ठहर सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि जनप्रतिनिधियों को शिक्षकों के तबादलों में हस्तक्षेप की अनुमति देने से “राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों और शिक्षकों के समुदाय के बीच एक सहज गठजोड़” बनने की आशंका है।

जस्टिस श्रीपाद ने कहा कि शिक्षकों को राजनीतिक दलों और निर्वाचित प्रतिनिधियों से दूरी बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने टिप्पणी की, “कैंपस में राजनीतिक हस्तक्षेप या राजनीतिक निकटता साधारण रूप से अवांछनीय है और खासकर शिक्षकों के तबादले के मामलों में। इसके विपरीत तर्क देना प्रदूषण-संभावित होगा।”

अदालत ने चेतावनी दी कि शिक्षक समुदाय का राजनीतिकरण “ज़हरीले पेड़ के फल” जैसा परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

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अदालत ने न्यायालयीन टिप्पणी में राजनीतिक दार्शनिक हन्ना अरेन्ट के एक निबंध का उल्लेख करते हुए लिखा:
“शिक्षा का राजनीति में कोई स्थान नहीं है, क्योंकि राजनीति में हम हमेशा उन लोगों से निपटते हैं जो पहले से शिक्षित होते हैं।”

अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत इस बात को रेखांकित करता है कि शिक्षकों को राजनीतिक प्रभाव से दूर रहना चाहिए।

अचलन न हो, इसलिए अदालत ने यह व्यवस्था दी कि जिन शिक्षकों ने नए स्थानों पर जॉइन कर लिया है, वे वर्तमान शैक्षणिक वर्ष 2025-26 के अंत तक वहीं कार्यरत रहेंगे। उसके एक सप्ताह के भीतर उन्हें अपने पुराने पदस्थापन स्थान पर लौटना होगा।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले से सरकार को मौजूदा ट्रांसफर गाइडलाइंस के अनुसार नई तबादला प्रक्रिया शुरू करने से नहीं रोका गया है।

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