“कल आप कहेंगे कि रूमाल की भी निगरानी करें”: सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के नेकबैंड से जुड़ी याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों द्वारा पहने जाने वाले नेकबैंड (Neckbands) में ‘नॉन-बायोडिग्रेडेबल’ सामग्री के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकीलों की वेशभूषा या छोटी-मोटी वस्तुओं के प्रबंधन जैसे मामले संवैधानिक अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

सीजेआई (CJI) भूषण आर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि अदालत हर व्यक्तिगत वस्तु या कचरा प्रबंधन के सूक्ष्म मुद्दों की निगरानी नहीं कर सकती।

दिवाली की सफाई और याचिका की पृष्ठभूमि

यह याचिका साक्षी विजय द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने खुद को एक वकील की पत्नी बताया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस मामले की शुरुआत उनके घर में दिवाली की सफाई के दौरान हुई। उन्होंने बताया कि सफाई करते समय उन्हें घर में पुराने और बेकार पड़े वकीलों के बैंड का एक ढेर मिला।

साक्षी विजय का दावा था कि ये सभी बैंड सिंथेटिक या ऐसी सामग्री से बने थे जो पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं (non-biodegradable) हैं। इसी आधार पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी। उन्होंने अपनी याचिका में केंद्रीय कानून मंत्रालय और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को भी पक्षकार बनाया था और मांग की थी कि पूरे देश में पुराने बैंड को इकट्ठा करने और रिसाइकिल करने के लिए एक ‘इको-फ्रेंडली’ तंत्र बनाया जाए।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “हम कहां तक दखल दें?”

पीठ ने इस मामले को न्यायिक हस्तक्षेप के लायक नहीं माना। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट कपड़ों और निजी इस्तेमाल की चीजों को विनियमित (regulate) करने लगेगा, तो इसका कोई अंत नहीं होगा।

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सीजेआई गवई ने टिप्पणी की:

“कल को आप कहेंगे कि हम इस बात की भी निगरानी शुरू कर दें कि रूमाल (Handkerchief) का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है और उसे कैसे धोया जा रहा है? एक संवैधानिक अदालत इन सब चीजों की निगरानी में कहां तक जा सकती है?”

पीठ ने आगे कहा कि व्यक्तिगत वस्तुओं के निपटान से लेकर शहरी या ग्रामीण कचरा प्रबंधन जैसे मुद्दे प्रशासनिक दायरे में आते हैं और सुप्रीम कोर्ट इनका दैनिक आधार पर प्रबंधन नहीं कर सकता।

फैसला

अदालत ने इसे “वॉर्डरोब पुलिसिंग” (कपड़ों की निगरानी) जैसा मामला मानते हुए कहा कि इसमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन जैसा कोई मुद्दा नहीं है। पीठ ने याचिका को आधारहीन मानते हुए “खारिज” (Dismissed) कर दिया और स्पष्ट किया कि वकीलों के बैंड के कपड़े की गुणवत्ता तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है।

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