राजस्थान हाईकोर्ट ने सड़क हादसों पर स्वत: संज्ञान लिया, सरकार से मांगी रिपोर्ट; कहा—‘मानव जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता’

राजस्थान हाईकोर्ट ने मंगलवार को राज्य में हाल में हुई सड़क दुर्घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि सड़क सुरक्षा सुधार के लिए अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी और न्यायमूर्ति पी. एस. भाटी की खंडपीठ ने कहा कि हाल की घटनाओं ने अदालत को सड़क सुरक्षा के महत्व और तात्कालिकता पर जोर देने के लिए विवश कर दिया है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के जीवन के अधिकार का हवाला दिया।

अदालत की यह पहल हाल में हुए कई भीषण सड़क हादसों के बाद सामने आई है। पिछले महीने जैसलमेर में एक ए.सी. स्लीपर बस में आग लगने से 26 लोगों की मौत हो गई थी। इस सप्ताह फलोदी में टेम्पो ट्रैवलर और ट्रक की भिड़ंत में 15 लोगों की जान गई, जबकि जयपुर में एक तेज रफ्तार डंपर ट्रक ने दर्जनभर वाहनों को कुचल दिया, जिससे 14 लोगों की मौत हुई।

अदालत ने राज्य सरकार से प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी है कि सड़क सुरक्षा और दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए क्या ठोस उपाय किए गए हैं।
खंडपीठ ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, राजस्व, लोक निर्माण, नगरीय निकाय, गृह, परिवहन और एनएचएआई विभागों के अधिवक्ताओं के साथ-साथ अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त महाधिवक्ता को भी निर्देश दिया कि वे अपनी-अपनी विभागीय स्थिति और जिम्मेदारी पर विस्तृत जवाब दाखिल करें।

केंद्र और राज्य सरकार दोनों को जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है।

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अदालत ने पांच अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किए हैं और उनसे यह अपेक्षा की है कि वे सामूहिक रूप से एक सहमति-पत्र दाखिल करें, जिसमें सड़क और सार्वजनिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए ठोस सुझाव दिए जाएं।

खंडपीठ ने कहा कि हाल की घटनाओं ने “नियामक ढांचे को सक्रिय और सशक्त करने की तत्काल आवश्यकता” को उजागर किया है ताकि “बार-बार होने वाली मौतों और पीड़ा को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा सकें।”

अदालत ने कहा,

“जब राष्ट्र अपने मानव संसाधन को अत्यधिक मूल्य देता है, तब नागरिकों में सार्वजनिक और सड़क सुरक्षा के प्रति व्याप्त उदासीनता और लापरवाही समाजिक पीड़ा को और बढ़ा देती है।”

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अदालत ने यह भी कहा कि प्रस्तुत तथ्यों से यह स्पष्ट है कि यह केवल कुछ दुर्घटनाओं का मामला नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रणालीगत समस्या है, जिस पर न्यायिक हस्तक्षेप और दिशा-निर्देश आवश्यक हैं।

अदालत ने हालिया हादसों में मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की और मामले की अगली सुनवाई 13 नवंबर को निर्धारित की।

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