क्षतिपूरक वनीकरण में लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, मुंबई मेट्रो और जीएमएलआर प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने की अनुमति रद्द करने की चेतावनी

 सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुंबई में क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) के खराब क्रियान्वयन पर नाराज़गी जताते हुए महाराष्ट्र सरकार को कड़ी चेतावनी दी कि अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो मुंबई मेट्रो रेल और गोरेगांव-मुलुंड लिंक रोड (GMLR) जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए पेड़ काटने की अब तक दी गई सभी अनुमतियाँ रद्द कर दी जाएंगी।

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यह देखकर हैरानी होती है कि राज्य ने क्षतिपूरक वनीकरण को गंभीरता से नहीं लिया है। “हम अब तक दी गई सभी परियोजनाओं की अनुमति वापस ले लेंगे,” मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी दी।

पीठ ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे सभी संबंधित विभागों के साथ बैठक करें और “ठोस प्रस्ताव” तैयार करें कि राज्य में क्षतिपूरक वनीकरण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने कहा कि इस संबंध में 11 नवम्बर तक हलफनामा दाखिल किया जाए।

पीठ ने कहा कि देश के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, विशेष रूप से मुंबई जैसे शहरों में। मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “पर्यावरण की रक्षा निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन बुनियादी ढांचे का विकास भी उतना ही जरूरी है। बिना उचित इंफ्रास्ट्रक्चर के देश आगे नहीं बढ़ सकता।”

हालांकि, अदालत तब नाराज़ हुई जब यह बताया गया कि क्षतिपूरक वनीकरण के नाम पर मात्र एक फुट ऊँचे पौधे लगाए जा रहे हैं, जिनकी ठीक से देखभाल न होने के कारण वे सूख रहे हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि यह पूरा कार्यक्रम “केवल दिखावा” बनकर रह गया है। उन्होंने कहा कि मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (MMRCL) ने संजय गांधी नेशनल पार्क (SGNP) से भूमि लेकर वनीकरण का कार्य उसी पार्क प्रशासन को सौंप दिया है।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यदि बंजर वनभूमि पर भी वनीकरण किया जाए तो कोई आपत्ति नहीं, लेकिन यह काम गंभीरता से होना चाहिए।” उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि इतने बड़े प्रोजेक्ट्स की लागत के मुकाबले वनीकरण पर खर्च बहुत मामूली है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

अदालत बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसने जीएमएलआर प्रोजेक्ट के लिए पेड़ काटने की अनुमति मांगी थी। 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म सिटी क्षेत्र में 95 पेड़ काटने की अनुमति दी थी, बशर्ते कि क्षतिपूरक वनीकरण किया जाए।

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बीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि इस परियोजना के लिए कुल 1,000 से अधिक पेड़ हटाने होंगे, जिनमें से 632 पेड़ स्थानांतरित किए जाएंगे और 407 पेड़ों को स्थायी रूप से काटना पड़ेगा

पीठ ने फिलहाल पेड़ काटने की नई अनुमति देने से इनकार कर दिया और कहा कि मामला अब 11 नवम्बर को फिर सुना जाएगा, जब राज्य सरकार का हलफनामा और विशेषज्ञों की रिपोर्ट पेश की जाएगी।

जीएमएलआर परियोजना का उद्देश्य पश्चिमी एक्सप्रेस हाइवे को पूर्वी एक्सप्रेस हाइवे से जोड़ना है ताकि गोरेगांव और मुलुंड के बीच यात्रा का समय लगभग एक घंटे तक कम किया जा सके। यह 6.2 किलोमीटर लंबी जुड़वां सुरंग (ट्विन टनल) परियोजना है जो फिल्म सिटी, गोरेगांव से खिंडिपाड़ा (अमर नगर), मुलुंड तक जाएगी।

बीएमसी ने यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के 10 जनवरी के आदेश को ध्यान में रखते हुए दायर की थी, जिसमें अदालत ने कहा था कि आरे कॉलोनी में बिना अनुमति कोई पेड़ नहीं काटा जाएगा। बीएमसी ने कहा कि यह क्षेत्र फिल्म सिटी के अंतर्गत आता है, न कि आरे कॉलोनी के, लेकिन एहतियात के तौर पर उसने अनुमति के लिए अदालत का रुख किया।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति कोई भी पेड़ नहीं काटा जा सकता और बीएमसी को विशेषज्ञों की रिपोर्ट सहित अपना वनीकरण प्लान दाखिल करने को कहा।

अब यह मामला 11 नवम्बर को फिर से सुना जाएगा, जब महाराष्ट्र के मुख्य सचिव का हलफनामा अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा।

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