सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणीय मानकों के उल्लंघन पर पूर्वव्यापी मंजूरी देने पर रोक वाले आदेश की समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को लगभग 40 याचिकाओं के समूह पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। इन याचिकाओं में 16 मई के उस फैसले की समीक्षा या संशोधन की मांग की गई है, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पश्चात (post-facto) पर्यावरणीय मंजूरी देने के निर्णय को रद्द कर दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति उज्जल भुयान और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उद्योगिक इकाइयों, सरकारी निकायों और पर्यावरण समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकीलों की विस्तृत दलीलें सुनीं।

16 मई को न्यायमूर्ति ए. एस. ओका (सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने अपने आदेश में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) और अन्य अधिकारियों को पर्यावरणीय उल्लंघन करने वालों को पूर्वव्यापी मंजूरी देने से रोक दिया था।

न्यायमूर्ति ओका, जिन्होंने यह फैसला लिखा था, ने माना कि प्रदूषण-मुक्त वातावरण में जीने का अधिकार, जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इसी आधार पर उन्होंने उन कंपनियों को दी गई पश्चात पर्यावरणीय मंजूरियों को रद्द कर दिया था, जिन्होंने पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन किया था।

इस फैसले में 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) और संबंधित परिपत्रों को “मनमाना, अवैध और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के विपरीत” करार दिया गया था। हालांकि, 2017 की अधिसूचना और 2021 के OM के तहत पहले से दी गई कुछ मंजूरियों को तत्काल प्रभाव से रद्द नहीं किया गया।

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वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें शुरू करते हुए कहा कि 16 मई के फैसले में “स्पष्ट त्रुटि” है क्योंकि इसमें उस विधिक स्रोत पर विचार नहीं किया गया, जिसके आधार पर संबंधित ऑफिस मेमोरेंडम जारी किए गए थे।

उन्होंने कहा, “ऑफिस मेमोरेंडम एनजीटी के आदेश के अनुपालन में पारित हुआ था। इसमें दो स्रोतों का उल्लेख है। यह पिछली पीठ के समक्ष रखा ही नहीं गया।” उन्होंने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 और 5 तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के निर्देशों का हवाला दिया।

सिब्बल ने कहा कि इन मेमोरेंडम का उद्देश्य उल्लंघनों को माफ करना नहीं बल्कि अनुपातिक दंड लगाना और अनुपालन सुनिश्चित करना था।
उन्होंने कहा, “यदि परियोजना अवैध है तो उसे बंद कर दिया जाएगा। यदि वह अनुमेय है लेकिन पर्यावरण के अनुरूप नहीं है, तो उसे भी बंद किया जा सकता है। यही अनुपातिकता का सिद्धांत है।”

उन्होंने जोड़ा, “पर्यावरण बहुत बड़ा मुद्दा है। यह तबाही मचा रहा है। बतौर एक वकील, मुझे यह कहना ही होगा। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि शक्तियों का कोई स्रोत ही नहीं था।”

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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो SAIL और एक सरकारी निकाय (AIIMS अस्पताल और मेडिकल कॉलेज निर्माण) का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने कहा कि 16 मई का निर्णय बाध्यकारी पूर्ववर्तियों और अधिसूचनाओं को नज़रअंदाज़ करता है।

उन्होंने कहा, “रिकॉर्ड पर स्पष्ट त्रुटि है।” SAIL 1990 के दशक से खनन कर रही थी जब EC की आवश्यकता नहीं थी, और बाद में 2017 के बाद के प्रावधानों का पालन किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरणीय विनियमन में पूर्ण निषेध के बजाय अनुपातिकता का सिद्धांत होना चाहिए, और 2017 तथा 2021 की अधिसूचनाएं इसी संतुलन को दर्शाती हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, संजय पारिख और आनंद ग्रोवर ने समीक्षा याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि पिछली मंजूरियों को मान्यता देना “कानूनविहीनता को बढ़ावा देने” जैसा होगा।

एक वकील ने तर्क दिया, “जो परियोजनाएं पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करती हैं, उन्हें कैसे पूर्वव्यापी मंजूरी दी जा सकती है?”

बहस के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने हंसी-मजाक में कहा, “आप कानून तोड़ते हैं और फिर उसे नियमित करा लेते हैं।” इस पर सिब्बल ने जवाब दिया, “मैं खुद इसका शिकार हूं। शिमला को देखिए… मैं वहां आठ साल रहा हूं।”

मुख्य न्यायाधीश ने पर्यावरण पक्ष के वकीलों से पूछा, “क्या आप चाहते हैं कि AIIMS और कैंसर अस्पताल जैसी परियोजनाओं को तोड़ दिया जाए?”

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मुख्य न्यायाधीश गवई ने स्पष्ट किया कि इस चरण में न्यायालय ऑफिस मेमोरेंडम के गुण-दोष पर विचार नहीं कर रहा है, बल्कि केवल यह देख रहा है कि 16 मई के फैसले की समीक्षा की जरूरत है या नहीं।

उन्होंने कहा, “हम इस समय OM को मेरिट पर नहीं देख रहे। हम केवल यह देख रहे हैं कि फैसले की समीक्षा होनी चाहिए या नहीं।”

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि पहले के फैसलों और अधिसूचनाओं की व्याख्या में कई समस्याएं हैं। उन्होंने कहा, “हमने सुप्रीम कोर्ट में वकीलों पर भरोसा न करने की आदत बना ली है। संदर्भ से हटकर लाइनें पढ़ी जाती हैं, पैराग्राफों को संदर्भ से काटकर पढ़ा जाता है।”

अब न्यायालय ने इन समीक्षा याचिकाओं पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। इस निर्णय का असर देशभर की बुनियादी ढांचा, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं पर व्यापक होगा, जिनमें से कई को 16 मई के आदेश के बाद बंद या ध्वस्त करने का खतरा है।

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