एयर इंडिया AI171 विमान हादसे की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका

एयर इंडिया की फ्लाइट AI171 के जून 12 को हुए भीषण हादसे, जिसमें 265 लोगों की मौत हुई थी, की स्वतंत्र और न्यायालय-निगरानी में जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।

यह याचिका कॉन्स्टिट्यूशन बाय सेफ्टी मैटर्स फाउंडेशन नामक विमानन सुरक्षा एनजीओ ने दायर की है, जिसका नेतृत्व कैप्टन अमित सिंह (FRAeS) कर रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) की आधिकारिक जांच नागरिकों के मौलिक अधिकारों—जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21), समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a))—का उल्लंघन करती है।

AAIB ने 12 जुलाई को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में हादसे के लिए “फ्यूल कटऑफ स्विच” को “रन” से “कटऑफ” की स्थिति में ले जाने को जिम्मेदार ठहराया, जिसे पायलट की गलती बताया गया। लेकिन याचिका में आरोप लगाया गया है कि रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण जानकारी जैसे डिजिटल फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (DFDR) का पूरा विवरण, कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) के संपूर्ण ट्रांसक्रिप्ट्स और इलेक्ट्रॉनिक एयरक्राफ्ट फॉल्ट रिकॉर्डिंग (EAFR) डेटा को छुपा दिया।

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याचिका में कहा गया है कि रिपोर्ट ने फ्यूल-स्विच की खराबी, इलेक्ट्रिकल फॉल्ट्स, रैम एयर टर्बाइन (RAT) की तैनाती और विद्युत गड़बड़ियों जैसे प्रणालीगत मुद्दों को नजरअंदाज किया और जल्दबाजी में हादसे का ठीकरा पायलट पर फोड़ दिया।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका शिकागो कन्वेंशन के अनुबंध 13 के खिलाफ है, जिसमें स्वतंत्र और रोकथाम-उन्मुख जांच अनिवार्य है। याचिका के अनुसार, इतनी बड़ी दुर्घटना की “चयनात्मक और पक्षपाती जांच” नागरिकों के जीवन और सुरक्षा के अधिकार का हनन है और सत्य सूचना दबाने का प्रयास है।

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12 जून को अहमदाबाद से लंदन के गैटविक हवाईअड्डे जा रहा एयर इंडिया का बोइंग 787-8 विमान मेडिकल हॉस्टल परिसर पर गिर गया। हादसे में 241 यात्रियों और चालक दल सहित कुल 265 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में 169 भारतीय, 52 ब्रिटिश, सात पुर्तगाली, एक कनाडाई नागरिक और 12 क्रू सदस्य शामिल थे।

इस हादसे में केवल एक ब्रिटिश नागरिक, विश्वासकुमार रमेश, जीवित बचे।

याचिका में कहा गया है कि इस पैमाने की दुर्घटना में “सच को तकनीकी भाषा और चयनात्मक खुलासों में दबाने” की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसलिए न्यायालय-निगरानी में स्वतंत्र जांच जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अब तक इस याचिका पर सुनवाई तय नहीं की है।

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