गंभीर संवैधानिक बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट में लगे ठहाके, CJI ने याद किया उस जज को जो केस तय करने के अलावा सब कुछ करते थे

सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष एक गंभीर संवैधानिक मुद्दे पर चल रही दस दिवसीय सुनवाई हास्य और रोचक क्षणों से भरी रही। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अपने एक पूर्व हाईकोर्ट सहयोगी को याद किया जो “मामलों पर फैसला करने के अलावा सब कुछ करते थे।” इसके साथ ही उन्होंने वरिष्ठ वकीलों की तेज-तर्रार दलीलों के साथ तालमेल बिठाने में न्यायाधीशों को आने वाली कठिनाई पर भी टिप्पणी की। यह पीठ राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर सहमति देने की समय-सीमा तय करने की न्यायपालिका की शक्ति पर एक प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई कर रही थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई, और न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर की संविधान पीठ एक प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर सुनवाई कर रही थी। इसमें लंबित विधेयकों पर कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति और राज्यपालों जैसे संवैधानिक अधिकारियों के लिए समय-सीमा तय करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों पर राय मांगी गई थी। रेफरेंस में यह सवाल भी उठाया गया था कि क्या लंबे समय तक निष्क्रियता के मामलों में अदालत द्वारा ‘मानित सहमति’ दी जा सकती है।

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अदालती कार्यवाही और टिप्पणियां

गंभीर सुनवाई के दौरान कई हल्के-फुल्के पल भी आए। जब पीठ एक आंतरिक चर्चा के लिए रुकी, तो सरकार की ओर से बहस कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने टिप्पणी की, “काश मैंने लिप-रीडिंग की कुछ कक्षाएं ली होतीं। जब हम बहस कर रहे होते हैं और न्यायाधीश आपस में कुछ चर्चा करते हैं, तो हम आशंकित हो जाते हैं।”

इस पर CJI गवई ने बॉम्बे हाईकोर्ट के दिनों का एक किस्सा साझा करते हुए स्पष्ट जवाब दिया। CJI ने कहा, “हम उस पर चर्चा नहीं कर रहे थे जिस पर पिछले तीन हफ्तों में बहस हुई है। यह बॉम्बे हाईकोर्ट में हमारे एक सहयोगी की तरह नहीं है, जो लंबी दलीलों के दौरान स्केच बनाते थे। वह पेंटिंग, बढ़ईगीरी और न जाने क्या-क्या करते थे, सिवाय मामलों पर फैसला करने के।”

बाद में, जब सॉलिसिटर जनरल अपनी जवाबी दलीलें समय पर पूरी करने के लिए तेजी से पढ़ रहे थे, तो CJI ने उनकी गति का अनुसरण करने में आने वाली चुनौती पर टिप्पणी की। CJI गवई ने कहा, “मैं 2019 में सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बना। छह साल बाद भी, मैं दिल्ली के वकीलों की गति के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहा हूं, जो पहला वाक्य पढ़ते हैं और फिर दसवां, और फिर किसी और वाक्य पर चले जाते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “न्यायमूर्ति नरसिम्हा को छोड़कर, हममें से चार लोगों को सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की गति से मेल बिठाना मुश्किल लगता है। कभी-कभी हम खोया हुआ महसूस करते हैं। हम 5,000 से अधिक पृष्ठों के पूरे लिखित दलीलों को पढ़ेंगे।”

न्यायमूर्ति नरसिम्हा, जो न्यायाधीश बनने से पहले सुप्रीम कोर्ट बार में एक वरिष्ठ अधिवक्ता थे, ने इस अवसर पर कानूनी बिरादरी को सलाह देते हुए कहा, “यह अगली पीढ़ी के वकीलों के लिए एक संदेश है, जिन्हें इस तरह स्किप-रीडिंग की आदत नहीं अपनानी चाहिए।”

न्यायिक हस्तक्षेप के खिलाफ दलीलें

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मामले के मुख्य कानूनी मुद्दे पर, सरकार ने अदालत द्वारा समय-सीमा तय करने का पुरजोर विरोध किया। अटॉर्नी जनरल ने यूनानी पौराणिक कथा “प्रोक्रस्टियन बेड” का हवाला देते हुए अदालत से आग्रह किया कि वह राज्यों को न्यायिक फैसलों के माध्यम से संविधान में संशोधन के लिए कोई जगह न दे, क्योंकि यह “संसद का एकमात्र विशेषाधिकार” है।

सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि राज्यपालों के लिए समय-सीमा तय करना “आत्म-विनाशकारी और उल्टा” होगा। उन्होंने कहा कि राज्यपाल संविधान की रक्षा के लिए दुर्लभ स्थितियों में ही सहमति रोकने के विवेक का प्रयोग करते हैं। ऐतिहासिक आंकड़ों का हवाला देते हुए, श्री मेहता ने कहा कि “पिछले 55 वर्षों में 17,000 से अधिक विधेयकों में से 94% से अधिक को सहमति दी गई और केवल 20 विधेयकों पर सहमति रोकी गई।”

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इस मामले में दलीलें पूरी हो चुकी हैं, और पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर अपनी राय सुरक्षित रख ली है।

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