सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग की जमानत याचिका पर सुनवाई के लिए 3 सितंबर की तारीख तय कर दी। गाडलिंग एल्गार परिषद–माओवादी संबंध मामले के आरोपी हैं और पिछले छह साल से अधिक समय से जेल में हैं।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने यह मामला सूचीबद्ध किया। अदालत को बताया गया कि 26 अगस्त को न्यायमूर्ति एम.एम. सुन्दरश ने इस याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।
इससे पहले न्यायमूर्ति सुन्दरश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ इस मामले की सुनवाई करने वाली थी। लेकिन उनके हटने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अब इस पर बुधवार को सुनवाई होगी। वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अदालत से तत्काल सुनवाई का आग्रह किया था, यह कहते हुए कि उनके मुवक्किल छह साल से अधिक समय से जेल में हैं और सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका पहले ही 11 बार स्थगित हो चुकी है।

मार्च 2024 में भी सुप्रीम कोर्ट ने गाडलिंग और सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति जगताप की जमानत याचिकाओं, तथा एनआईए की उस याचिका पर सुनवाई टाल दी थी जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत पाने वाले कार्यकर्ता महेश राउत की रिहाई को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले पर भी फैसला आगे बढ़ा दिया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि गाडलिंग ने माओवादियों को गोपनीय सरकारी जानकारी और नक्शे उपलब्ध कराए और फरार आरोपियों के साथ षड्यंत्र रचा। उन पर सुरजगढ़ खनन परियोजना का विरोध कराने और स्थानीय लोगों को आंदोलन में शामिल होने के लिए भड़काने का भी आरोप है।
गाडलिंग के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
एल्गार परिषद–माओवादी संबंध मामला 31 दिसंबर 2017 को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित सम्मेलन से जुड़ा है। पुलिस का कहना है कि सम्मेलन में दिए गए उत्तेजक भाषणों के बाद अगले दिन पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़क गई थी।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का कहना है कि सांस्कृतिक संगठन कबीर कला मंच (केकेएम), जिससे कुछ आरोपी जुड़े थे, प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) का मोर्चा संगठन है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में कहा था कि केकेएम की सदस्य ज्योति जगताप सम्मेलन में मंच से “अत्यंत उग्र और भड़काऊ नारे” लगाने में शामिल थीं। उनकी जमानत याचिका 2022 में खारिज कर दी गई थी।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने 3 सितंबर को गाडलिंग की जमानत याचिका सुनने का फैसला किया है, तब अदालत का रुख यह तय करेगा कि लंबे समय से जेल में बंद आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और यूएपीए जैसे गंभीर आरोपों के बीच संतुलन कैसे साधा जाएगा।