अभियुक्त का कोर्ट में आचरण, महत्वपूर्ण गवाहों से जिरह के अधिकार को नकारने का आधार नहीं हो सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक अभियुक्त के दो प्रमुख अभियोजन गवाहों से जिरह करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया था। न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने कहा कि किसी अभियुक्त द्वारा अपने वकील को बहस करने से रोकना, विशेषकर जब उसे हिरासत से पेश किया गया हो, मुकदमे के एक महत्वपूर्ण चरण को समाप्त करने का वैध कारण नहीं हो सकता, क्योंकि इससे अभियुक्त के प्रति “गंभीर पूर्वाग्रह” उत्पन्न होगा। हाईकोर्ट ने निचली अदालत को जिरह के लिए एक नया अवसर प्रदान करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका मनिराम पाल उर्फ मनिराम द्वारा अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, ई.सी. एक्ट, प्रतापगढ़ के 23 जून, 2025 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। यह मामला प्रतापगढ़ के पट्टी पुलिस स्टेशन में दर्ज केस क्राइम नंबर 257/2020 से संबंधित है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दर्ज किया गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह एफआईआर 24 सितंबर, 2020 को दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 156(3) के तहत एक आवेदन पर दर्ज की गई थी, जिसमें 27 फरवरी, 2020 की एक कथित घटना का उल्लेख था। याचिकाकर्ता मनिराम पाल को 29 अगस्त, 2023 को गिरफ्तार किया गया और 12 दिसंबर, 2024 को जमानत पर रिहा किया गया। उसकी हिरासत की अवधि के दौरान, दो प्रमुख गवाहों, PW-2 रमेश पाल और PW-3 डॉ. अनुज कुमार चौरसिया से क्रमशः 20 जून, 2024 और 21 अक्टूबर, 2024 को पूछताछ की गई थी। निचली अदालत ने इन गवाहों से जिरह का अवसर समाप्त कर दिया था और बाद में इन गवाहों को वापस बुलाने के लिए Cr.P.C. की धारा 311 के तहत दायर आवेदन को भी खारिज कर दिया था।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री शिव प्रकाश सिंह ने तर्क दिया कि आवेदन को अस्वीकार करने के निचली अदालत के कारण “निराधार और विकृत” थे। निचली अदालत ने यह नोट किया था कि जब याचिकाकर्ता को जेल से पेश किया गया, तो उसने चिल्लाना शुरू कर दिया और अपने वकील को बहस करने से मना कर दिया, जिसके कारण वकील ने मामले से अपना नाम वापस ले लिया। निचली अदालत ने यह भी कहा कि मामले की पैरवी कर रहे व्यक्ति (पैरोकार) द्वारा रिकॉर्ड पर मौजूद दूसरे वकील को नहीं बुलाया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि इस तरह के “सतही तरीके” से दो महत्वपूर्ण गवाहों से जिरह का अवसर समाप्त करने से गंभीर पूर्वाग्रह होगा।

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इस दलील के समर्थन में मंजू देवी बनाम राजस्थान राज्य (2019) 6 SCC 203 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें यह माना गया था कि Cr.P.C. की धारा 311 के तहत विवेकाधीन शक्तियों का उद्देश्य न्यायपूर्ण निर्णय सुनिश्चित करना है और किसी मामले की लंबी अवधि ऐसे आवेदन को अस्वीकार करने का एकमात्र कारण नहीं हो सकती।

इसके विपरीत, शिकायतकर्ता के वकील सुश्री स्वाति शर्मा और राज्य सरकार के वकील श्री सुशील पांडे ने याचिका का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने खुद अपने वकील को बहस करने से रोककर गवाहों से जिरह न करने का विकल्प चुना था। उन्होंने इसे मुकदमे में देरी करने की “टालमटोल की रणनीति” बताया और निचली अदालत के आदेश को उचित ठहराया।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद Cr.P.C. की धारा 311 के दायरे का विश्लेषण किया, जो अदालत को किसी भी व्यक्ति को फिर से बुलाने और उसकी दोबारा जांच करने का अधिकार देती है, यदि उसका साक्ष्य मामले के न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।

हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत का तर्क त्रुटिपूर्ण था। कोर्ट ने कहा कि चूंकि अभियुक्त को जेल से पेश किया गया था, इसलिए “चीजें उसके नियंत्रण में नहीं थीं।” हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अभियुक्त द्वारा अपने वकील को बहस करने का निर्देश देना “मुकदमे के एक महत्वपूर्ण चरण, यानी जिरह का अवसर न देने का कारण नहीं हो सकता।”

फैसले में निचली अदालत द्वारा एक प्रक्रियात्मक चूक की ओर भी इशारा किया गया। कोर्ट ने कहा, “…निचली अदालत को अभियुक्त से पूछना चाहिए था कि क्या वह अपने मामले में कोई दूसरा वकील या न्याय मित्र चाहता है, जो कि आक्षेपित आदेश से स्पष्ट रूप से गायब है।”

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जिरह के महत्व पर जोर देते हुए, कोर्ट ने कहा, “जिरह का अवसर सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है और इसमें विफल रहने पर निश्चित रूप से पूर्वाग्रह होगा।” कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि मुकदमे का सर्वोपरि लक्ष्य सत्य का पता लगाना और न्यायपूर्ण निर्णय पर पहुंचना है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस प्रावधान का दायरा और उद्देश्य अदालत को सत्य का निर्धारण करने और मामले के न्यायपूर्ण निर्णय पर पहुंचने के लिए सभी प्रासंगिक तथ्यों की खोज करने में सक्षम बनाना है, जो वास्तव में एक मुकदमे का सर्वोपरि लक्ष्य है।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि PW-2 और PW-3 महत्वपूर्ण गवाह हैं, इसलिए उनसे जिरह का अवसर “अनिवार्य” है। निचली अदालत के 23 जून, 2025 के आदेश को “अस्थिर” पाते हुए, हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर दिया।

परिणामस्वरूप, याचिका स्वीकार कर ली गई और निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को एक उपयुक्त तारीख पर दोनों गवाहों, PW-2 और PW-3, से जिरह का अवसर प्रदान करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अभियुक्त सहयोग नहीं करता है, तो निचली अदालत कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र होगी।

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