कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाइक टैक्सी पर लगी रोक पर उठाए सवाल, कहा- आजीविका के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती सरकार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुधवार को राज्य सरकार के बाइक टैक्सी पर लगाए गए प्रतिबंध की कड़ी आलोचना की और कहा कि सरकार के तर्क “कमज़ोर” और “कानूनी रूप से अस्थिर” हैं।

मुख्य न्यायाधीश विभू बाखरु की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि देश के कम से कम 13 राज्यों में बाइक टैक्सी की अनुमति है और यह शहरी परिवहन का एक वैध एवं आवश्यक साधन बन चुका है।

“ये सेवाएं विलासिता नहीं, बल्कि सस्ती और प्रभावी ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ के लिए ज़रूरी हैं,” मुख्य न्यायाधीश ने कहा।

अदालत ने मोटर वाहन अधिनियम का हवाला देकर प्रतिबंध लगाने के राज्य सरकार के रुख को खारिज करते हुए कहा कि केवल नीति की अनुपस्थिति को आधार बनाकर हज़ारों लोगों को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उनके काम करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

“सिर्फ नियमन की कमी, सम्पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं हो सकती,” अदालत ने टिप्पणी की।

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अदालत ने महाधिवक्ता (एजी) को निर्देश दिया कि फिलहाल बाइक टैक्सी संचालकों के खिलाफ कोई दंडात्मक या ज़बरन कार्रवाई न की जाए। एजी ने अदालत को आश्वस्त किया कि बाइक टैक्सी के लिए नीति बनाने का मुद्दा सरकार के “सर्वोच्च स्तर” पर विचाराधीन है।

पीठ ने यह भी पूछा कि क्या राज्य सरकार ने सचेत नीतिगत निर्णय लेकर बाइक टैक्सी को बाहर रखा है, और चेतावनी दी कि यदि ऐसा है तो इसे मज़बूत कानूनी आधार के बिना न्यायालय में सही नहीं ठहराया जा सकता।

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अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।

विकास से खुश होकर बाइक टैक्सी वेलफेयर एसोसिएशन ने कहा कि वह सरकार और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि सेवाएं सुरक्षित, कानूनी और टिकाऊ ढंग से संचालित हों।

“यह सकारात्मक कदम है, जो हमारे सेवाओं के महत्व को यात्रियों और चालकों दोनों के लिए मान्यता देता है,” एसोसिएशन ने बयान में कहा।

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