सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत के लिए पहले स्वेच्छा से जमा राशि को बाद में ‘कठोर’ बताकर छूट की मांग करने की प्रवृत्ति पर जताई नाराज़गी, GST चोरी मामले में हाईकोर्ट के आदेश को बरक़रार रखा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ी आपत्ति जताई जिसमें आरोपी पहले ज़मानत पाने के लिए भारी राशि जमा करने की पेशकश करते हैं और बाद में उन्हीं शर्तों को ‘कठोर’ बताकर उसमें राहत चाहते हैं।

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की जिसमें मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए ज़मानत की शर्त को चुनौती दी गई थी। यह मामला ₹13.73 करोड़ की कथित टैक्स चोरी से जुड़ा है, जो केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 के तहत दर्ज हुआ था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रति सजग है, लेकिन उसे “न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता” बनाए रखना भी ज़रूरी है। पीठ ने कहा, “इस बात में कोई विवाद नहीं कि अत्यधिक ज़मानत, ज़मानत नहीं होती और ज़मानत देते समय कठोर शर्तें नहीं लगाई जानी चाहिए। हालांकि, किसी शर्त का कठोर होना हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

इस मामले में याचिकाकर्ता को 27 मार्च को जीएसटी चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उसने मद्रास हाईकोर्ट में ज़मानत की अर्जी दी थी। 8 मई की सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि ₹2.86 करोड़ पहले ही जमा किया जा चुका है और वह ज़मानत के लिए और ₹2.50 करोड़ तक जमा करने को तैयार हैं।

इस पेशकश के आधार पर हाईकोर्ट ने ₹50 लाख ज़मानत से पहले और बाकी ₹2 करोड़ 10 दिनों में जमा करने की शर्त पर ज़मानत दी। ₹10 लाख के बॉन्ड पर याचिकाकर्ता को रिहा भी कर दिया गया।

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हालांकि, कुछ ही दिन बाद याचिकाकर्ता ने ₹50 लाख अग्रिम जमा करने में असमर्थता जताकर शर्त में संशोधन की मांग की। हाईकोर्ट ने 14 मई को आदेश में संशोधन करते हुए पूरी ₹2.50 करोड़ राशि 10 दिनों के भीतर जमा करने की अनुमति दी, अन्य शर्तें यथावत रहीं।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में संशोधित आदेश को चुनौती दी और इसे अत्यधिक व अनुचित बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार करते हुए कि ज़मानत की शर्तें इतनी न हों कि ज़मानत ही न मिल पाए, इस रणनीति की निंदा की जिसमें आरोपी पहले बड़ी रकम जमा करने का प्रस्ताव देते हैं और फिर पीछे हट जाते हैं। पीठ ने कहा, “हम इस प्रवृत्ति की घोर निंदा करते हैं। यदि पहले यह पेशकश नहीं की गई होती, तो हाईकोर्ट मामले के गुण-दोष के आधार पर फैसला कर सकता था।”

चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही हाईकोर्ट के संशोधित आदेश के तहत रिहा हो चुका है, सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और ₹2.50 करोड़ की 10 दिन में जमा करने की शर्त को बरक़रार रखा।

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