उपराष्ट्रपति धनखड़ ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामले की जांच समिति की वैधता पर उठाए सवाल

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए गठित तीन जजों की इन-हाउस समिति की वैधानिकता और संवैधानिक आधार पर गंभीर सवाल खड़े किए।

वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया द्वारा संपादित पुस्तक ‘द कॉन्स्टीट्यूशन वी अडॉप्टेड’ के विमोचन समारोह में बोलते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस प्रकार की जांच समितियों का कोई संवैधानिक आधार नहीं है और यह न तो पारदर्शी हैं और न ही प्रभावी।

“अब सोचिए, दो हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों ने कितनी मेहनत की। एक हाईकोर्ट (पंजाब और हरियाणा) का कार्यक्षेत्र दो राज्य और एक केंद्रशासित प्रदेश है। वे एक ऐसी जांच में शामिल थे, जिसका कोई संवैधानिक आधार या कानूनी वैधता नहीं थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि इसका कोई परिणाम नहीं निकलता,” उपराष्ट्रपति ने कहा।

उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत बनी इस तरह की जांच समितियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं और इनकी रिपोर्टों की कोई कानूनी बाध्यता नहीं होती।

“यह जांच रिपोर्ट किसी को भी भेजी जा सकती है, यह सिर्फ कोर्ट की प्रशासनिक प्रणाली का हिस्सा है,” उन्होंने कहा।

READ ALSO  क्या सौतेला पिता अपने सौतेले बेटे से भरण-पोषण पाने का हकदार है? जानिए हाईकोर्ट का निर्णय

इलेक्ट्रॉनिक सबूत और मनी ट्रेल पर भी उठाए सवाल

धनखड़ ने यह भी सवाल उठाया कि जनता को यह तक नहीं बताया गया कि क्या इस जांच में कोई इलेक्ट्रॉनिक सबूत बरामद हुए, या फिर बरामद पैसे की उपयोगिता और स्रोत का कोई सुराग मिला।

“घटना हो गई और एक सप्ताह तक 140 करोड़ की आबादी वाला देश कुछ नहीं जान सका। सोचिए, ऐसी कितनी घटनाएं और हुई होंगी। हर एक घटना आम आदमी को प्रभावित करती है,” उन्होंने कहा।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की सराहना

उपराष्ट्रपति ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने न्यायमूर्ति वर्मा से संबंधित प्रारंभिक रिपोर्ट को सार्वजनिक कर विश्वास की एक छोटी सी बहाली की।

बता दें कि 8 मई को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इस इन-हाउस समिति की रिपोर्ट को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा था, जब न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था, बावजूद इसके कि समिति ने उन्हें दोषी ठहराया था।

READ ALSO  सहानुभूति और करुणा उत्तर पुस्तिका पुनर्मूल्यांकन का आदेश माँगने में कोई भूमिका नहीं निभातेः इलाहाबाद हाईकोर्ट

वीरास्वामी निर्णय की समीक्षा की मांग

उपराष्ट्रपति ने 1991 के सुप्रीम कोर्ट के के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ निर्णय की भी समीक्षा की जरूरत बताई, जिसके तहत उच्च न्यायपालिका के जजों पर कार्रवाई के लिए इन-हाउस प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

“यह निर्णय एक ऐसा अभेद्य कवच प्रदान करता है, जिससे न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों असहाय हो जाते हैं,” उन्होंने कहा।

“एक ऐसा ढांचा खड़ा हो गया है, जो जवाबदेही और पारदर्शिता के सभी प्रयासों को निष्फल कर देता है। अब इस व्यवस्था को बदलने का समय आ गया है,” उन्होंने जोर देते हुए कहा।

वैज्ञानिक और पारदर्शी जांच की आवश्यकता

धनखड़ ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष, वैज्ञानिक और पारदर्शी जांच की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जब तक दोषियों को न्याय के कटघरे में नहीं लाया जाता, तब तक व्यवस्था में जनता का विश्वास बहाल नहीं हो सकता।

READ ALSO  तलाक का तथ्य साबित किए बिना मुस्लिम पत्नी को भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट

“आज कई नाम चर्चा में हैं, कई प्रतिष्ठाएं खतरे में हैं। जब दोषी सामने आएंगे, तब व्यवस्था की शुद्धि होगी और छवि में सुधार आएगा। हर कोई तब तक निर्दोष है, जब तक कि उसका अपराध सिद्ध न हो जाए,” उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles