[धारा 138 एनआई अधिनियम] शिकायतकर्ता को वित्तीय क्षमता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं; केवल विशिष्ट आपत्ति उठाने पर अभियुक्त पर भार स्थानांतरित होता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत कार्यवाही में शिकायतकर्ता को प्रारंभ में पैसे उधार देने की वित्तीय क्षमता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। केवल तब जब अभियुक्त इस संबंध में विशिष्ट आपत्ति उठाता है, तभी यह भार अभियुक्त पर स्थानांतरित होता है कि वह वैधानिक अनुमान का खंडन करे।

यह निर्णय क्रिमिनल अपील संख्या 4171/2024 में सुनाया गया, जिसका शीर्षक था अशोक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य, जिसे न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने 2 अप्रैल, 2025 को पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि:

शिकायतकर्ता-अपीलकर्ता अशोक सिंह ने शिकायत वाद संख्या 6650/2012 दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि रविंद्र प्रताप सिंह (प्रतिवादी संख्या 2) ने ₹22 लाख का ऋण लिया और उसके बदले चेक संख्या 726716 दिनांक 17.03.2010, बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा जारी किया।

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जब यह चेक IDBI बैंक में प्रस्तुत किया गया, तो 07.05.2010 को “payment stopped by drawer” टिप्पणी के साथ अस्वीकृत हो गया। इसके बाद 18.05.2010 को वैधानिक नोटिस भेजा गया, लेकिन न तो प्रतिवादी ने उत्तर दिया और न ही भुगतान किया। इस पर एनआई अधिनियम की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई।

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निचली अदालत एवं हाईकोर्ट की कार्यवाही:

  • विचारण न्यायालय का निर्णय (12.04.2019):
    रविंद्र प्रताप सिंह को दोषी ठहराया गया और एक वर्ष के साधारण कारावास तथा ₹35 लाख के जुर्माने (जिसमें ₹30 लाख प्रतिकर के रूप में) की सजा सुनाई गई।
  • अपील न्यायालय का निर्णय (23.10.2020):
    सजा और दोषसिद्धि की पुष्टि की गई।
  • हाईकोर्ट का निर्णय (21.02.2024, क्रिमिनल रिवीजन संख्या 619/2020):
    अभियुक्त को बरी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ऋण लेन-देन को प्रमाणित नहीं कर सका क्योंकि उसने न तो बैंक से निकासी का प्रमाण दिया, न ही चेक की सुपुर्दगी की तारीख या व्यवसायिक संबंध सिद्ध किए।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रमुख विधिक प्रश्न:

  1. क्या हाईकोर्ट द्वारा धारा 138 के तहत दोषसिद्धि को पलटना उचित था?
  2. क्या शिकायतकर्ता को ₹22 लाख उधार देने की वित्तीय क्षमता प्रारंभ में सिद्ध करनी आवश्यक थी?
  3. क्या साझेदारी फर्म (M/s Sun Enterprises) को अभियुक्त न बनाए जाने से शिकायत दोषपूर्ण हो जाती है?
  4. क्या अभियुक्त धारा 118 और 139 के वैधानिक अनुमान का प्रभावी खंडन कर सका?
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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय:

1. वित्तीय क्षमता पर निर्णय:

न्यायालय ने कहा कि शिकायतकर्ता को प्रारंभ में अपनी वित्तीय क्षमता सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट द्वारा बैंक निकासी या लाइसेंस की मांग करना कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण था।

“शुरुआत में भार शिकायतकर्ता पर नहीं होता… केवल तभी वह भार आता है जब यह विशिष्ट आपत्ति उठाई जाती है कि वह वित्तीय रूप से सक्षम नहीं था,” कोर्ट ने कहा।

कोर्ट ने Rohitbhai Jivanlal Patel बनाम गुजरात राज्य, (2019) 18 SCC 106 मामले पर भरोसा किया, जिसमें यह कहा गया कि धारा 139 का अनुमान तब तक प्रभावी रहेगा जब तक अभियुक्त पर्याप्त साक्ष्य से उसका खंडन न करे।

2. वैधानिक अनुमान:

अभियुक्त ने चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए थे, जिससे वैधानिक रूप से देनदारी सिद्ध होती है। अभियुक्त का यह दावा कि चेक 2010 में खो गया था और 2011 में पुलिस में रिपोर्ट किया, अविश्वसनीय और संदेहपूर्ण माना गया।

3. साझेदारी फर्म को अभियुक्त न बनाने का प्रश्न:

भले ही चेक M/s Sun Enterprises के नाम पर था, कोर्ट ने कहा कि शिकायत स्वीकार्य है क्योंकि रविंद्र प्रताप सिंह चेक पर हस्ताक्षरकर्ता और फर्म का उत्तरदायी व्यक्ति था।

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कोर्ट ने Aneeta Hada बनाम Godfather Travels और Sunita Palita बनाम Panchami Stone Quarry जैसे मामलों को समरस किया।

“चेक पर हस्ताक्षरकर्ता को अभियुक्त बनाया गया है और वह फर्म का उत्तरदायी व्यक्ति भी है, इसलिए शिकायत विधिसंगत है,” कोर्ट ने स्पष्ट किया।

अंतिम निर्णय:

  • दोषसिद्धि बहाल की गई।
  • कारावास की सजा हटाई गई।
  • जुर्माना ₹32 लाख तक घटाया गया, जिसे चार महीने के भीतर भुगतान करना होगा।
  • डिफॉल्ट क्लॉज:
    यदि भुगतान नहीं किया गया, तो मूल सजा – एक वर्ष का कारावास और ₹35 लाख जुर्माना फिर से प्रभावी हो जाएगा।

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