छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के एक मामले में कई आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, इस बात पर जोर देते हुए कि चश्मदीद गवाहों की गवाही में मामूली विसंगतियां जरूरी नहीं कि उनकी विश्वसनीयता को कम कर दें। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सत्र वाद संख्या 175/2016 में दुर्ग के छठे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दिए गए एक साझा फैसले से उत्पन्न आपराधिक अपीलों के एक समूह की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दुर्ग जिले के पथरा गांव में 31 मार्च, 2016 को गणेश भारती की नृशंस हत्या के इर्द-गिर्द घूमता है। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि यह घटना शिकायतकर्ता पक्ष और आरोपी के बीच मामूली कहासुनी के कारण हुई। यह संघर्ष तब और बढ़ गया जब आरोपियों ने बांस के डंडे, बेसबॉल के बल्ले और फरसा (एक प्रकार की कुल्हाड़ी) जैसे घातक हथियारों से लैस होकर पीड़ित और उसके परिवार के सदस्यों पर हमला कर दिया।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक और उसके रिश्तेदारों का आरोपियों ने पीछा किया, जो हत्या करने के इरादे से एक गैरकानूनी सभा का हिस्सा थे। जबकि शिकायतकर्ता एक चारदीवारी फांदकर भागने में सफल रहे, मृतक गणेश भारती को पकड़ लिया गया और बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसकी मौत हो गई। बाद में उसका शव एक स्कूल के शौचालय के पास मिला, जिस पर कई गहरे घाव थे।
कानूनी मुद्दे और तर्क
अपीलकर्ताओं, जिनका प्रतिनिधित्व अधिवक्ता सुश्री स्वाति वर्मा, श्री वीरेंद्र वर्मा और सुश्री लक्ष्मीन टोडे ने किया, ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे उनके अपराध को साबित करने में विफल रहा। उन्होंने तर्क दिया कि:
यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, जिसमें हत्या से उन्हें जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष प्रत्यक्षदर्शी नहीं था।
अभियोजन पक्ष का मामला गवाहों के बयानों में विरोधाभासों और असंगतियों से भरा हुआ था।
अधिकांश हथियारों को अपराध से जोड़ने वाले फोरेंसिक साक्ष्य की अनुपस्थिति ने अभियोजन पक्ष के दावों को कमजोर कर दिया।
कुछ आरोपियों के पास ऐसे सबूत थे, जिनसे साबित होता है कि वे अपराध स्थल पर मौजूद नहीं थे।
दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ राज्य ने सरकारी वकील श्री एस.एस. बघेल और आपत्तिकर्ता के वकील श्री जितेन्द्र गुप्ता द्वारा प्रतिनिधित्व करते हुए अपीलों का कड़ा विरोध किया, जिसमें कहा गया कि:
गैरकानूनी सभा में आरोपियों की मौजूदगी संदेह से परे साबित हुई।
फोरेंसिक रिपोर्ट ने पुष्टि की कि जब्त किए गए कुछ हथियारों पर मानव रक्त पाया गया था।
मृतक पर चोटें आरोपियों से बरामद हथियारों के अनुरूप थीं।
गवाहों ने लगातार आरोपियों की पहचान की थी और हत्या की ओर ले जाने वाली घटनाओं के अनुक्रम का विवरण दिया था।
न्यायालय की टिप्पणियाँ और निर्णय
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और तर्कों की गहन जांच करने के बाद अपीलों को खारिज कर दिया और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 148 (घातक हथियारों से लैस होकर दंगा करना) और 302 को 149 (अवैध रूप से एकत्रित होकर हत्या करना) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा। न्यायालय ने टिप्पणी की:
“चश्मदीद गवाहों की गवाही में मामूली विसंगतियां उनकी विश्वसनीयता को कम नहीं करती हैं। गवाहों के बयानों में छोटी-मोटी विसंगतियां होना स्वाभाविक है, खासकर ऐसे मामलों में जब कई हमलावर और उच्च-तनाव की स्थिति हो। महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके मूल कथन में एकरूपता हो।”
पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित मिसालों का हवाला दिया, खासकर मंजूनाथ एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य (2023) और लक्ष्मण सिंह बनाम बिहार राज्य (2021) में, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि मामूली विसंगतियां अन्यथा विश्वसनीय साक्ष्य को खराब नहीं करती हैं।
न्यायालय ने कुछ अभियुक्तों द्वारा प्रस्तुत किए गए बहाने के बचाव को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया कि बहाने को साबित करने का भार अभियुक्तों पर है और बिना दस्तावेजी सबूत के मौखिक गवाही से कोई बहाना साबित नहीं हो सकता। अपीलकर्ताओं को हत्या के आरोप में आजीवन कारावास और 2,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई, जबकि दंगा करने के आरोप में 500 रुपये के जुर्माने के साथ दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।