अमीश देवगन और अर्नब गोस्वामी का फैसला तब लागू नहीं होता जब एक ही अपराध के तहत अलग-अलग घटनाओं के लिए अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की जाती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि जहां एक ही संज्ञेय अपराध से जुड़ी अलग-अलग घटनाएं लेकिन अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई थीं, वहां सुप्रीम कोर्ट के अमीश देवगन और अर्नब गोस्वामी के फैसले लागू नहीं होंगे।

बेंच ने एक मामले पर विचार करते हुए यह देखा, जहां आरोपी ने कथित तौर पर 4000 करोड़ के घोटाले में तीन लाख लोगों को धोखा दिया, जिसके कारण अलग-अलग लेनदेन के संबंध में अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गईं।

पृष्ठभूमि:-

निवेशक कंपनी (GIPL) ने जनता से निवेश प्राप्त किया और बाद में उस धन से लाभ प्राप्त किया जो निवेशक के खातों में जमा किया जाना चाहिए था। इसके बाद जीआईपीएल ने पैसे को डायवर्ट करने के लिए नोबल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड में एक बैंक खाता खोला, जिसमें याचिकाकर्ता सीईओ है।

उसके बाद, नोबल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड द्वारा निवेशकों को 2,61,000 चेक जारी किए गए जिनमें जीआईपीएल के निर्देशों पर बड़ी मात्रा में शामिल थे। इसके अलावा, बैंक ने कथित तौर पर सीईओ की जानकारी के बिना चेक जारी किए।

फिर राशि अन्य खातों में जारी की गई, जिसका अर्थ था कि कंपनी के खाते में कोई पैसा नहीं था। यह आरोप लगाया जाता है कि बैंक को लेन-देन के बारे में पता था लेकिन फिर भी उक्त चेक जारी किए, जिससे निवेशकों को प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रेरित किया गया।

कोर्ट के सामने मुद्दा:

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ सैकड़ों एफआईआर दर्ज हो, इसलिए याचिकाकर्ता को प्रत्येक में रिमांड के लिए पेश किया जाता है, जबकि ऐसे मामले में बाकि FIR को  सीआरपीसी की धारा 162 के तहत बयान मन जाना चाहिए। इसलिए पुलिस से अनुरोध किया गया था कि वह उन सभी मामलों में याचिकाकर्ता को पेश न करे।

कोर्ट का विश्लेषण।

अमीश देवगन मामले का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दो बिंदु बताय हैं: –

जहां एक घटना एक से अधिक अपराधों को जन्म देती है, उसके परिणामस्वरूप प्रत्येक संज्ञेय अपराध के लिए अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती है। जांच सभी संज्ञेय अपराधों से संबंधित होनी चाहिए, इसलिए पुलिस को अलग-अलग एफआईआर दर्ज नहीं करनी चाहिए।

यदि एक घटना के परिणामस्वरूप पहली प्राथमिकी के बाद कई प्राथमिकी दर्ज होती हैं, तो अन्य को सीआरपीसी की धारा 162 के तहत बयानों के रूप में माना जाना चाहिए।

हालांकि, बेंच ने कहा कि देवगन मामला तत्काल मामले में लागू नहीं होगा क्योंकि अलग-अलग व्यक्तियों ने अलग-अलग घटनाओं के लिए प्राथमिकी दर्ज की थी।

अर्नब गोस्वामी के फैसले का भी संदर्भ दिया गया था, और बेंच ने कहा कि यह लागू नहीं होगा क्योंकि अलग-अलग घटनाओं के लिए जिसमें एक ही संज्ञेय अपराध शामिल है, अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज की गई थी, और प्रत्येक प्राथमिकी में सबूत अलग-अलग मामलों को संदर्भित करेगा।

आदेश:-

पीठ ने याचिकाकर्ता की प्रार्थना पर विचार करने से इनकार कर दिया।

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