गवाहों का मुकरना या बयानों में विरोधाभास दोषमुक्ति का आधार नहीं, यदि मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अपराध सिद्ध करते हों: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सौरभ पंडा की हत्या के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी कुसुमलाल साव की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीज़न बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि मेडिकल रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं, तो गवाहों के मुकरने (Hostile) या उनके बयानों में मामूली विरोधाभास से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता और यह दोषमुक्ति का आधार नहीं बन सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला फरवरी 2019 का है। अभियोजन के अनुसार, 7 फरवरी की रात आरोपी कुसुमलाल साव और मृतक सौरभ पंडा के बीच किसी बात को लेकर विवाद हुआ था। इस दौरान आरोपी ने पेंचकस और लोहे की डाई से सौरभ पर जानलेवा हमला किया और फिर साक्ष्य छिपाने के इरादे से शव को देवगांव स्थित एक सुनसान खेत में फेंक दिया। 9 फरवरी की सुबह सौरभ का शव बरामद हुआ था। जांच के दौरान पुलिस ने आरोपी के घर से खून से सने कपड़े, मिट्टी और हत्या में इस्तेमाल हथियार बरामद किए थे। 30 मार्च 2024 को सारंगढ़ की निचली अदालत ने आरोपी को धारा 302 और 201 के तहत दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील श्री मतीन सिद्दीकी ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला संदेह के घेरे में है। उन्होंने दलील दी कि चश्मदीद गवाह (PW-9 और PW-11) अपने बयानों से मुकर गए हैं और उन्होंने अदालत में कहा कि मृतक उस रात आरोपी के घर आया ही नहीं था। बचाव पक्ष ने इसे एक सड़क हादसा बताने की कोशिश की और हथियारों की बरामदगी को भी फर्जी बताया।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील श्री शालीन सिंह बघेल ने दलील दी कि केवल गवाहों के मुकर जाने से पूरा मामला खारिज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप मैसेज, मेडिकल रिपोर्ट और ‘लास्ट सीन’ (मृतक को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा जाना) की परिस्थितियां आरोपी के दोष को पूरी तरह सिद्ध करती हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करने के बाद पाया कि अभियोजन की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं।

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1. मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य: पोस्टमार्टम रिपोर्ट (PW-25) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मृतक के सिर की हड्डी टूटी हुई थी और दिमाग बाहर आ गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“चोटों की प्रकृति को देखते हुए यह बेहद असंभव लगता है कि मृतक मोटरसाइकिल लेकर खेत के बीच में गया होगा और वहां अचानक गिर गया होगा।”

2. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका: कोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत प्रस्तुत व्हाट्सएप संदेशों को महत्वपूर्ण माना। इन संदेशों से स्पष्ट हुआ कि घटना की रात दोनों के बीच विवाद हुआ था और आरोपी उसे मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया था।

3. गवाहों का मुकरना: बचाव पक्ष की मुख्य दलील को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास या कुछ गवाहों का मुकर जाना अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता, बशर्ते अन्य साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हों।”

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आरोपी के शरीर पर चोट के निशान थे जिनका उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया, और शव को सुनसान जगह फेंकना अपराध छिपाने की उसकी मंशा को दर्शाता है।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन ने हत्या, आपसी विवाद और हथियारों की बरामदगी को संदेह से परे साबित किया है। बेंच ने निचली अदालत के फैसले में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई और कुसुमलाल साव की अपील को खारिज करते हुए उसकी सजा बरकरार रखी। आरोपी 11 फरवरी 2019 से जेल में है और उसे अपनी शेष सजा काटनी होगी।

केस विवरण

  • केस टाइटल: कुसुमलाल साव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1482 ऑफ 2024
  • बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • दिनांक: 13 मार्च, 2026

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