क्या पत्नी का अधिक योग्य होना और कमाने की क्षमता रखना अंतरिम भरण पोषण मना करने का आधार हो सकता है?

हाल ही में, दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश और मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के निर्णय द्वारा दी गई अंतरिम भरण पोषण के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोहराया कि सिर्फ इसलिए कि पत्नी योग्य है और उसके पास जीवनयापन करने की क्षमता है, यह भरण पोषण के दावे को खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।

पृष्ठभूमि:-

याचिकाकर्ता ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत मामला दर्ज किया था, जिसमे मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी जिसमें याचिकाकर्ता को प्रतिवादी-पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 16,500 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता कि दलील:-

याचिकाकर्ता ने कहा कि वह केवल 12वीं पास था और 22,500 रुपये कमा रहा था। इसके विपरीत, प्रतिवादी-पत्नी ने इग्नू से स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम किया और एटीडीसी, गुड़गांव से परिधान निर्माण प्रौद्योगिकी में डिप्लोमा प्राप्त किया और एक अच्छा जीवनयापन कर सकती थी।
याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रतिवादी याचिकाकर्ता को परेशान करने के लिए कोई काम नहीं कर रही थी, और अदालत ने पत्नी के टैक्स रिटर्न को न पढ़कर गलती की और यह तर्क कि याचिकाकर्ता प्रति माह 50,000 रुपये कमा रहा था, असत्य था।

प्रतिवादी की दलीलें: –

याचिकाकर्ता के खाते में पैसा होने की अधीनस्थ अदालत की टिप्पणी को गलत नहीं कहा जा सकता है। यह प्रस्तुत किया गया था कि याचिकाकर्ता एक निजी फर्म में काम कर रहा था और एक व्यवसाय चला रहा था और प्रति माह लगभग 1,00,000 रुपये कमाता था।

कोर्ट की टिप्पणियां:-

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने बैंक स्टेटमेंट में लेनदेन की व्याख्या करने में असमर्थ था। प्रतिवादी याचिकाकर्ता की तुलना में अधिक योग्य थी परन्तु यह भरण पोषण के दावे को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों द्वारा पारित आदेश किसी हस्तक्षेप की मांग नहीं करते हैं।

निर्णय:-

न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों को बरकरार रखा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रतिवादी को अंतरिम भरण पोषण के रूप में प्रति माह 16,500 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।

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