राज्यसभा ने सोमवार को विवादास्पद वक्फ संशोधन विधेयक को 128 मतों के समर्थन और 95 मतों के विरोध के साथ पारित कर दिया। यह विधेयक पहले ही लोकसभा से पारित हो चुका है और अब राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया है।
विधेयक का उद्देश्य 1995 के मौजूदा वक्फ कानून में संशोधन करना है। इसके प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर राजनीतिक दलों और विभिन्न समुदायों में गहन बहस छिड़ गई। वोटिंग से पहले बीजू जनता दल ने अपने सांसदों को “अंतरात्मा की आवाज़” पर मतदान करने की छूट दी, जो इस मुद्दे की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
बहस के मुख्य बिंदु
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने बहस का नेतृत्व किया और यह स्पष्ट किया कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय के हितों के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा,
“यह धर्म का नहीं, संपत्ति प्रबंधन का मामला है। हमारा उद्देश्य भ्रष्टाचार को खत्म करना है, इसलिए किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले स्वामित्व प्रमाणित करना अनिवार्य होगा।”
हालांकि, विपक्ष की ओर से कांग्रेस के सैयद नसीर हुसैन और AIMIM के इम्तियाज़ जलील ने विधेयक पर आपत्ति जताई। उन्होंने वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्य नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संपत्तियों को लेकर और अधिक विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
सैयद नसीर हुसैन ने यह भी कहा कि कई मामलों में मुस्लिम समुदाय से जुड़ी ऐतिहासिक संपत्तियों की गलत पहचान की गई है, और यह विधेयक समस्याएं सुलझाने के बजाय नई समस्याएं खड़ी कर सकता है।
केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा ने विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा कि कई मुस्लिम बहुल देशों में भी वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता और डिजिटलीकरण के लिए इसी तरह के सुधार किए गए हैं। उन्होंने कहा कि
“विपक्ष असली मुद्दों से भटक रहा है और मुस्लिम समुदाय के वंचित वर्गों की जरूरतों की अनदेखी कर रहा है।”
विवादास्पद प्रावधान और आगे की प्रक्रिया
विधेयक में कुछ विवादास्पद प्रावधान जोड़े गए हैं, जिनमें मुख्य हैं:
- केंद्रीय वक्फ परिषद और स्थानीय वक्फ बोर्डों में अनिवार्य रूप से दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति।
- केवल वही व्यक्ति वक्फ को संपत्ति दान कर सकते हैं जिन्होंने कम से कम पांच वर्षों तक इस्लाम का पालन किया हो।
इससे “इस्लाम का पालन करने वाले” व्यक्ति की पहचान और हाल ही में धर्म परिवर्तन करने वालों के अधिकारों को लेकर व्यावहारिक सवाल उठने लगे हैं।
राज्यसभा से पारित होने के बाद अब यह विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर की प्रतीक्षा कर रहा है। यदि राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है, तो यह विधेयक कानून बन जाएगा और भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन की दिशा को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
राजनीतिक असर
इस विधायी प्रक्रिया ने कई दलों के भीतर और आपसी मतभेदों को उजागर कर दिया है। कुछ सांसदों ने पार्टी लाइन से हटकर मतदान किया। इस विधेयक का पारित होना धार्मिक संपत्तियों के प्रशासन और सरकार की भूमिका को लेकर राष्ट्रीय बहस में एक अहम मोड़ साबित हो सकता है।
