तलाक के मामलों में ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ की कोई जगह नहीं, यह निजता का हनन है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का अहम फैसला

क्या तलाक के मुकदमे में पत्नी का ‘कौमार्य परीक्षण’ (Virginity Test) या ‘टू-फिंगर टेस्ट’ कराया जा सकता है? इस बेहद संवेदनशील सवाल पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि तलाक की कार्यवाही में पत्नी के चरित्र या यौन इतिहास को खंगालने के लिए मेडिकल टेस्ट की मांग करना न केवल अप्रासंगिक है, बल्कि यह उसकी निजता (Privacy) और गरिमा (Dignity) पर सीधा हमला है।

एकल पीठ के न्यायमूर्ति विवेक जैन ने पति की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने यह साबित करने के लिए पत्नी के मेडिकल टेस्ट की मांग की थी कि क्या उसने कभी किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक पति-पत्नी के बीच चल रहे तलाक के विवाद से जुड़ा है। पति (याचिकाकर्ता) ने ‘क्रूरता’ (Cruelty) के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी। उसका मुख्य आरोप था कि पत्नी ने शादी के बाद उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया है।

दूसरी ओर, पत्नी ने अपने बचाव में पति पर गंभीर आरोप लगाए। उसने लिखित बयान में कहा कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा है और पति ने उसके साथ अप्राकृतिक कृत्य (Sodomy) किया है।

इस पर पति ने फैमिली कोर्ट में एक अजीबोगरीब आवेदन दिया। उसका तर्क था कि चूंकि पत्नी ने उस पर ‘सोडोमी’ का आरोप लगाया है और वह (पति) कह रहा है कि उनके बीच कोई संबंध नहीं बना, इसलिए दूध का दूध और पानी का पानी करने के लिए पत्नी का मेडिकल परीक्षण कराया जाए। पति यह जानना चाहता था कि क्या पत्नी ने कभी किसी के साथ यौन संबंध बनाए हैं या क्या वह कभी अप्राकृतिक कृत्य का शिकार हुई है।

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फैमिली कोर्ट ने 5 दिसंबर 2025 को इस मांग को खारिज कर दिया था, जिसके बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

हाईकोर्ट में पति के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के शारदा बनाम धर्मपाल (2003) फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि वैवाहिक मामलों में सच सामने लाने के लिए मेडिकल टेस्ट कराया जा सकता है और इसमें निजता का अधिकार आड़े नहीं आता। वकील का कहना था कि क्रूरता के आरोपों को साबित करने के लिए यह जांच जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा- यह ‘वर्जिनिटी टेस्ट’ की मांग है

न्यायमूर्ति विवेक जैन ने मामले की गहराई को समझते हुए पति की दलीलों को अस्वीकार कर दिया। कोर्ट ने अपने विश्लेषण में कहा कि पति जिस मेडिकल जांच की मांग कर रहा है, वह असल में “शब्दों के हेरफेर में पत्नी के वर्जिनिटी टेस्ट की मांग” ही है।

कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि शारदा वाले मामले में मेडिकल टेस्ट की अनुमति इसलिए दी गई थी क्योंकि वहां तलाक का आधार ‘नपुंसकता’ या ‘मानसिक बीमारी’ (सिजोफ्रेनिया) था, जिसे बिना मेडिकल जांच के साबित नहीं किया जा सकता था।

लेकिन मौजूदा मामले में तलाक का आधार ‘यौन संबंध बनाने से इनकार करना’ है। कोर्ट ने कहा:

“पक्षकारों का यौन संबंध बनाना या न बनाना तलाक का आधार नहीं है। यह तथ्य केवल इस सीमित उद्देश्य के लिए प्रासंगिक हो सकता है कि क्या पत्नी ने संबंध बनाने से इनकार करके पति के प्रति क्रूरता की है। इसके लिए पत्नी के शरीर की जांच कराने की जरूरत नहीं है।”

‘टू-फिंगर टेस्ट’ असंवैधानिक और अपमानजनक

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के झारखंड राज्य बनाम शैलेंद्र कुमार राय (2022) और दिल्ली हाईकोर्ट के सिस्टर सेफी मामले का जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों ने ‘टू-फिंगर टेस्ट’ या वर्जिनिटी टेस्ट को पहले ही प्रतिगामी और अवैज्ञानिक बताकर खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति जैन ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान यह मानता है कि हाइमन (Hymen) का फटना केवल यौन संबंधों से नहीं, बल्कि खेलकूद या अन्य गतिविधियों से भी हो सकता है। ऐसे में, यह जांच किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए निर्णायक नहीं हो सकती।

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सोडोमी के आरोप पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि कथित घटना बहुत पुरानी है, तो इतने वर्षों बाद मेडिकल जांच में इसका पता लगाना संभव नहीं है। ऐसी जांच केवल महिला को अपमानित करने और उसकी निजता में दखल देने का काम करेगी।

फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि पति की यह मांग संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पत्नी के गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन करती है। यौन संबंध बनाने से इनकार करना क्रूरता का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे साबित करने के लिए अन्य साक्ष्य दिए जा सकते हैं, इसके लिए महिला के शरीर की ‘पवित्रता’ की जांच करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पति की याचिका खारिज कर दी।

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