उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक व्यक्ति के खिलाफ दहेज उत्पीड़न मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि तलाक और पत्नी के पुनर्विवाह के बाद इस मामले को जारी रखना केवल “अनावश्यक प्रताड़ना” है और न्यायिक प्रक्रिया का “दुरुपयोग” होगा।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकल पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए देहरादून के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित कार्यवाही, आरोपपत्र और समन आदेश को रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी का विवाह वर्ष 2009 में हुआ था। लेकिन समय के साथ स्वभाव में असंगति और वैवाहिक मतभेद के कारण दोनों अलग रहने लगे। वर्ष 2016 में पत्नी ने पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498A और 323 एवं दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
पति ने आरोपों को झूठा और बढ़ा-चढ़ाकर बताया। इसके बाद पति ने तलाक की याचिका दायर की, जिसे अदालत ने 2018 में स्वीकार कर लिया। तलाक के बाद महिला ने पुनर्विवाह कर लिया।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि यह मुकदमा मूलतः एक वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ था, जो अब समाप्त हो चुका है। न्यायालय ने कहा:
“जब विवाह समाप्त हो चुका है और पत्नी का पुनर्विवाह हो गया है, तब ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना केवल पति को अनावश्यक रूप से परेशान करने जैसा होगा।”
न्यायालय ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए पूरे मामले की कार्यवाही को रद्द कर दिया।

