उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2018 में हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में दर्ज गैंगरेप मामले में दो व्यक्तियों की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है, यह कहते हुए कि अभियोजन पक्ष चिकित्सीय और फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर बलात्कार का आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। हालांकि, न्यायालय ने एक सह-आरोपी की अपहरण के अपराध में दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
यह निर्णय न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने 12 फरवरी को 2019 के ट्रायल कोर्ट के फैसले के विरुद्ध दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया।
अभियोजन के अनुसार, मानसिक रूप से दिव्यांग महिला लापता हो गई थी और बाद में उसे व्यथित अवस्था में बरामद किया गया। जांच के दौरान उसका चिकित्सीय परीक्षण तथा फॉरेंसिक जांच कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने इन साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को गैंगरेप का दोषी ठहराया था।
हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट और चिकित्सीय अभिलेखों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कहा कि चिकित्सीय राय से बलात्कार का आरोप निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं होता। न्यायालय ने फॉरेंसिक जांच में कमियों की ओर भी संकेत किया और कहा कि उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य आरोपियों को कथित यौन अपराध से नहीं जोड़ते।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आपराधिक दोषसिद्धि केवल संदेह या आशंका के आधार पर नहीं, बल्कि विधिसम्मत एवं विश्वसनीय साक्ष्यों पर ही टिक सकती है।
खंडपीठ ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि एक आरोपी ने पीड़िता को उसके विधिक अभिभावकों की अभिरक्षा से बाहर ले गया था। इसलिए उसके विरुद्ध अपहरण की दोषसिद्धि को कायम रखा गया।
चूंकि आरोपी चार वर्ष से अधिक की कारावास अवधि पहले ही पूरी कर चुका है, जिसे न्यायालय ने अपहरण के अपराध की सजा के समकक्ष माना, इसलिए दोनों आरोपियों की रिहाई का आदेश दिया गया।
न्यायालय ने कहा कि कमजोर या संवेदनशील पीड़ितों से जुड़े मामलों में न्यायालयों को संवेदनशील रहना चाहिए, किंतु “संदेह से परे प्रमाण” का आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत शिथिल नहीं किया जा सकता।

