यूएलसी एक्ट (ULC Act) के तहत सिर्फ ‘कागजी कब्जा’ काफी नहीं, वास्तविक कब्जाधारक को नोटिस देना अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट 

सुप्रीम कोर्ट ने अर्बन लैंड (सीलिंग एंड रेगुलेशन) एक्ट, 1976 (“यूएलसी एक्ट”) और उसके निरसन (रिपील) कानून की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल अतिरिक्त जमीन का राज्य सरकार में “निहित” (vesting) हो जाना ही काफी नहीं है। यदि एक्ट के निरस्त होने से पहले सरकार ने जमीन का “वास्तविक कब्जा” (de facto possession) नहीं लिया था, तो वह जमीन सरकार की नहीं मानी जाएगी।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने गुजरात उच्च न्यायालय के 2014 के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) ने धारा 10(5) के तहत उन लोगों को अनिवार्य नोटिस नहीं भेजा था जिनका जमीन पर वास्तविक कब्जा था। इस चूक के कारण, अर्बन लैंड (सीलिंग एंड रेगुलेशन) रिपील एक्ट, 1999 की धारा 4 के तहत पूरी कार्यवाही समाप्त (abate) मानी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने दलसुखभाई बच्चूभाई सतासिया व अन्य बनाम गुजरात राज्य व अन्य (2026 INSC 21) के मामले में अपील स्वीकार करते हुए अपीलकर्ताओं को अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) सहित सभी राहतें देने का आदेश दिया है।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद सूरत के कतारगाम गांव में स्थित 9,303 वर्ग मीटर भूमि से जुड़ा था। यह जमीन मूल रूप से कुबेरभाई नथुभाई की थी। यूएलसी एक्ट के तहत कार्यवाही के दौरान, सक्ष म प्राधिकारी ने जनवरी 1989 में इस जमीन के एक हिस्से (662.18 वर्ग मीटर) को “अतिरिक्त भूमि” घोषित कर दिया था।

हालांकि, इससे पहले 1983-84 के दौरान ही अपीलकर्ताओं (सब-प्लॉट धारकों) ने इस जमीन पर प्लॉट खरीदे थे और वहां हीरा काटने और पॉलिश करने जैसी छोटी औद्योगिक इकाइयां स्थापित कर ली थीं। वे वहां वास्तविक कब्जे में थे।

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22 नवंबर 1990 को, प्राधिकारी ने यूएलसी एक्ट की धारा 10(5) के तहत जमीन सरेंडर करने का नोटिस जारी किया, लेकिन यह नोटिस जमीन पर काबिज अपीलकर्ताओं को न भेजकर मूल भूस्वामी को भेजा गया। इसके बाद, 21 जनवरी 1992 को डिप्टी कलेक्टर ने एक पंचनामा तैयार कर दावा किया कि उन्होंने जमीन का कब्जा ले लिया है, जबकि जमीन पर अपीलकर्ताओं का कब्जा बना रहा।

समस्या तब और बढ़ी जब 2007-08 में अधिकारियों ने यह कहते हुए एनओसी (NOC) देने से इनकार कर दिया कि जमीन सरकार में निहित हो चुकी है। गुजरात उच्च न्यायालय ने भी अपीलकर्ताओं को “अवैध कब्जाधारी” मानते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं का पक्ष: उन्होंने तर्क दिया कि वे जमीन पर भौतिक रूप से काबिज थे, इसलिए कानूनन धारा 10(5) का नोटिस उन्हें दिया जाना चाहिए था। चूंकि उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला और न ही उनसे कब्जा लिया गया, इसलिए रिपील एक्ट आने के बाद जमीन अधिग्रहण की कार्यवाही अपने आप समाप्त (abate) हो जानी चाहिए।

गुजरात सरकार का पक्ष: राज्य सरकार का कहना था कि 1992 में ही मुआवजे का अंतिम आदेश पारित हो चुका था और जमीन सरकार में निहित हो गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि मूल मालिक को नोटिस दिया गया था, जो पर्याप्त था, और अपीलकर्ताओं की खरीद अवैध थी।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य बनाम हरि राम (2013) के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने “वेस्टिंग” (निहित होना) और “कब्जा” (Possession) के बीच गहरा अंतर स्पष्ट किया।

  1. वेस्टिंग बनाम वास्तविक कब्जा: कोर्ट ने कहा कि धारा 10(3) के तहत जमीन का सरकार में निहित होना केवल कानूनी (de jure) अधिकार देता है। वास्तविक कब्जा (de facto possession) लेने के लिए सरकार को प्रक्रिया का पालन करना होता है, जिसमें स्वैच्छिक सरेंडर या नोटिस के बाद शांतिपूर्ण/बलपूर्वक कब्जा लेना शामिल है।
  2. कागजी कब्जा मान्य नहीं: कोर्ट ने पाया कि 1992 में बनाया गया पंचनामा केवल एक “कागजी कार्रवाई” थी। चूंकि अपीलकर्ताओं को नोटिस नहीं दिया गया और वे मौके पर मौजूद थे, इसलिए सरकार ने कभी भी कानूनन कब्जा नहीं लिया।
  3. नोटिस की अनिवार्यता: पीठ ने एपी इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट कॉरपोरेशन बनाम तहसीलदार (2025) के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 10(5) के तहत कब्जाधारी को नोटिस देना अनिवार्य है, वैकल्पिक नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि रिपील एक्ट लागू होने की तारीख तक जमीन का वास्तविक कब्जा अपीलकर्ताओं के पास था और सरकार ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया, इसलिए अधिग्रहण की कार्यवाही निरस्त मानी जाएगी। कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ताओं को एनओसी जारी करें और उनके अधिकारों को मान्यता दें।

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