UAPA: 90 दिन की अवधि समाप्त होने से पहले जांच का समय बढ़ाना वैध, आरोपी को डिफॉल्ट बेल का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43-D(2)(b) के तहत जांच की अवधि विस्तार की अनुमति प्रारंभिक 90 दिनों की समाप्ति से पहले दे दी जाती है, तो इसे वैधानिक समय का वैध विस्तार माना जाएगा। ऐसी स्थिति में, आरोपी 90 दिन पूरे होने पर CrPC की धारा 167(2) (अब BNSS की धारा 187(2)) के तहत ‘डिफॉल्ट बेल’ के अटल अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने रमेश मंडावी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। अपील में विशेष न्यायाधीश (NIA एक्ट), उत्तर बस्तर, कांकेर के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनके माध्यम से जांच की अवधि बढ़ाई गई थी और बाद में डिफॉल्ट बेल की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता रमेश मंडावी, जो ग्राम पंचायत अर्रा के पूर्व सरपंच रह चुके हैं, को 16 जुलाई, 2025 को थाना अंतागढ़ (कांकेर) में दर्ज प्राथमिकी संख्या 16/2022 के संबंध में गिरफ्तार किया गया था। उन पर IPC की विभिन्न धाराओं, आर्म्स एक्ट और UAPA की धाराओं के तहत प्रतिबंधित नक्सली संगठनों के साथ संलिप्तता का आरोप लगाया गया था।

जांच पूरी करने की प्रारंभिक 90 दिनों की वैधानिक अवधि 14 अक्टूबर, 2025 को समाप्त हो रही थी। हालांकि, 7 अक्टूबर, 2025 को ही विशेष न्यायाधीश ने जांच अधिकारी के आवेदन को स्वीकार करते हुए जांच का समय 180 दिनों तक बढ़ा दिया। इसके बाद, 14 अक्टूबर बीत जाने पर अपीलकर्ता ने डिफॉल्ट बेल के लिए आवेदन किया, जिसे 17 अक्टूबर, 2025 को अदालत ने खारिज कर दिया।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुश्री प्रियंका शुक्ला ने तर्क दिया कि 7 अक्टूबर का विस्तार आदेश कानूनी रूप से शून्य (void) था क्योंकि आरोपी को न तो व्यक्तिगत रूप से और न ही वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में पेश किया गया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जिगर उर्फ ​​जिमी प्रविणचंद्र अडतिया बनाम गुजरात राज्य (2023) मामले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी की उपस्थिति एक अनिवार्य क्षेत्राधिकार संबंधी आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि विस्तार आदेश बिना किसी स्वतंत्र लोक अभियोजक (Public Prosecutor) की रिपोर्ट के यांत्रिक रूप से पारित किया गया था।

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राज्य की ओर से उप सरकारी अधिवक्ता श्री सौम्य राय ने दलील दी कि विस्तार का आवेदन एक विस्तृत प्रगति रिपोर्ट के आधार पर दिया गया था। इसमें फरार सह-आरोपियों की गिरफ्तारी, जारी तलाशी अभियान और UAPA की धारा 45 के तहत आवश्यक वैधानिक मंजूरी लंबित होने का उल्लेख था। उन्होंने स्पष्ट किया कि 7 अक्टूबर की कार्यवाही के दौरान अपीलकर्ता के वकील मौजूद थे और उन्होंने उस समय कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने UAPA की धारा 43-D(2)(b) का विश्लेषण करते हुए नोट किया कि जांच अवधि बढ़ाने की शक्ति लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर निर्भर है, जो जांच की प्रगति और हिरासत की आवश्यकता के विशिष्ट कारणों को दर्शाती हो।

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विस्तार सुनवाई के दौरान आरोपी की पेशी न होने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने अवलोकन किया:

“आदेश पत्र (Order sheet) इंगित करता है कि संबंधित तिथि पर आरोपी का प्रतिनिधित्व वकील के माध्यम से किया गया था… इन परिस्थितियों में, यह नहीं माना जा सकता कि आदेश को अवैध (non est) बनाने के लिए कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।”

लोक अभियोजक की रिपोर्ट की आवश्यकता पर हाईकोर्ट ने पाया कि वैधानिक आवश्यकताओं का पालन किया गया था। कोर्ट ने कहा:

“सिर्फ इसलिए कि आधार लंबित जांच कदमों से संबंधित हैं, विस्तार अवैध नहीं हो जाता; बल्कि, UAPA के तहत अपराधों में जांच की प्रगति और निरंतर हिरासत की आवश्यकता का आकलन करने के लिए ऐसे कारक प्रासंगिक हैं।”

डिफॉल्ट बेल के ‘अटल अधिकार’ पर खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार सशर्त है। यह केवल तब उत्पन्न होता है जब निर्धारित अवधि बिना आरोप पत्र (charge-sheet) दाखिल किए या बिना किसी ‘वैध विस्तार’ के समाप्त हो जाती है। कोर्ट ने कहा:

“एक बार जब कानून के अनुसार और अनुमेय समय सीमा के भीतर विस्तार प्रदान कर दिया जाता है, तो डिफॉल्ट बेल के प्रयोजनों के लिए वैधानिक अवधि स्वचालित रूप से नब्बे दिनों से बढ़कर एक सौ अस्सी दिन हो जाती है। इसका कानूनी परिणाम यह है कि अधिकार की गणना विस्तारित अवधि के अनुसार स्थानांतरित हो जाती है।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि जांच की अवधि 90 दिन बीतने से पहले ही वैध रूप से 180 दिनों तक बढ़ा दी गई थी, इसलिए 14 अक्टूबर, 2025 को अपीलकर्ता के पक्ष में डिफॉल्ट बेल का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ था। अदालत ने विशेष न्यायाधीश के आदेशों में कोई “स्पष्ट अवैधता या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि” न पाते हुए अपील को खारिज कर दिया।

केस का शीर्षक: रमेश मंडावी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

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केस संख्या: सीआरए संख्या 2656/2025

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