महंगाई भत्ता कर्मचारियों का कानूनी अधिकार; सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को AICPI के आधार पर एरियर चुकाने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निर्धारित किया है कि महंगाई भत्ता (Dearness Allowance – DA) प्राप्त करना कर्मचारियों का “कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार” (Legally Enforceable Right) है, और यह सरकार की ओर से कोई “दया या इनाम” नहीं है। 5 फरवरी, 2026 को सुनाए गए इस फैसले में, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने कर्मचारियों को वर्ष 2008 से 2019 की अवधि के लिए ‘अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक’ (AICPI) के आधार पर डीए के एरियर (बकाया राशि) का भुगतान करे।

शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की “फंड की कमी” (Paucity of Funds) की दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्तीय असमर्थता को आधार बनाकर कर्मचारियों को उनके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। भुगतान की समयसीमा और प्रक्रिया की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस विवाद की जड़ें पश्चिम बंगाल राज्य द्वारा 2008 में गठित 5वें वेतन आयोग की सिफारिशों में निहित हैं। इन सिफारिशों के बाद, राज्य ने पश्चिम बंगाल (वेतन और भत्ते का संशोधन) नियम, 2009 (ROPA Rules) लागू किए, जिन्हें 1 जनवरी, 2006 से प्रभावी माना गया था।

ROPA नियमों के नियम 3(1)(c) के तहत “मौजूदा परिलब्धियों” (Existing Emoluments) को परिभाषित किया गया था, जिसमें बेसिक पे के साथ “इंडेक्स एवरेज 536 (1982=100)” के अनुसार डीए शामिल था। हालांकि, 23 फरवरी, 2009 को जारी एक स्पष्टीकरण ज्ञापन (Clarificatory Memorandum) और बाद की अधिसूचनाओं के माध्यम से, राज्य सरकार ने डीए की दरों में संशोधन किया, जो केंद्र सरकार द्वारा उपयोग किए जाने वाले AICPI मानक से अलग थीं।

कर्मचारी संघों ने आरोप लगाया कि राज्य ने शुरुआत में केंद्र सरकार के पैटर्न का पालन किया लेकिन 2010 के बाद इसे बंद कर दिया। मामला राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (Tribunal) और फिर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा। 20 मई, 2022 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि डीए प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का एक पहलू है और राज्य को केंद्र सरकार की दरों पर डीए देना चाहिए। इस फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

राज्य सरकार (अपीलकर्ता) का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान और हुजेफा अहमदी ने राज्य की ओर से तर्क दिया:

  • संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II के तहत संघीय स्वायत्तता का हवाला देते हुए कहा गया कि केंद्र सरकार की दरों पर डीए देने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
  • एरियर के भुगतान से राज्य पर लगभग 41,770 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ेगा। तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम टीएनईबी थोज़िलालर अय्किया संगम (2019) मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि वित्तीय क्षमता एक प्रासंगिक कारक है।
  • ROPA नियमों में साल में दो बार डीए देने का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है।
  • हाईकोर्ट का यह कहना गलत था कि डीए अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है।

कर्मचारियों (प्रतिवादी) का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, पी.एस. पटवालिया, विकास रंजन भट्टाचार्य और करुणा नंदी ने कर्मचारियों की ओर से तर्क दिया:

  • मुद्रास्फीति (महंगाई) का मुकाबला करने और “जीवन निर्वाह वेतन” (Living Wage) की रक्षा के लिए डीए आवश्यक है।
  • चूंकि राज्य ने वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था और AICPI को शामिल करते हुए ROPA नियम बनाए थे, इसलिए कर्मचारियों का कानूनी अधिकार बन गया है।
  • हरियाणा राज्य लघु सिंचाई नलकूप निगम बनाम जी.एस. उप्पल (2008) का हवाला देते हुए कहा गया कि फंड की कमी कानूनी अधिकार को विफल नहीं कर सकती।
  • नई दिल्ली (बंगा भवन) और चेन्नई में तैनात कर्मचारियों को उच्च डीए दिया जा रहा है, जो भेदभावपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

1. महंगाई भत्ते की प्रकृति

जस्टिस करोल ने पीठ के लिए फैसला लिखते हुए कहा कि डीए मुद्रास्फीति के खिलाफ सुरक्षा का एक व्यावहारिक साधन है। कोर्ट ने कहा:

“महंगाई भत्ता कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है, बल्कि यह जीवन के न्यूनतम स्तर को बनाए रखने का एक साधन है। यह गरिमा के संवैधानिक विचार से जुड़ा हुआ है।”

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2. ROPA नियमों का वैधानिक बल

कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 309 का विश्लेषण करते हुए माना कि ROPA नियमों को वैधानिक (Statutory) बल प्राप्त है। चूंकि नियम 3(1)(c) में स्पष्ट रूप से “इंडेक्स एवरेज 536 (1982=100)” को शामिल किया गया था, इसलिए राज्य कार्यकारी ज्ञापनों (Executive Memoranda) के माध्यम से इस मानक से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने बाद में जारी किए गए ज्ञापनों को “स्पष्ट रूप से मनमाना” (Manifestly Arbitrary) करार दिया।

3. वित्तीय असमर्थता का तर्क खारिज

पीठ ने वित्तीय कठिनाई की दलील को अस्वीकार करते हुए सख्त टिप्पणी की:

“लोकतंत्र में राज्य से कम से कम यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने दायित्वों का सम्मान करे… फंड की कमी आधार बनाकर राज्य अपने कर्मचारियों को डीए के भुगतान से इनकार नहीं कर सकता।”

4. संघीय स्वायत्तता

संघीय ढांचे पर राज्य के तर्क को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने कहा कि यद्यपि राज्य के पास वित्तीय स्वायत्तता है और वह शुरू में केंद्र का पालन करने के लिए बाध्य नहीं था, लेकिन राज्य ने स्वयं अपने नियमों में केंद्रीय पैटर्न (AICPI) को शामिल करने का विकल्प चुना था। कोर्ट ने कहा कि अब राज्य अपने ही विधायी अभ्यास से पीछे नहीं हट सकता।

5. अनुच्छेद 21 और मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की जिसमें डीए को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार बताया गया था, क्योंकि पक्षों ने इस प्रश्न पर जोर नहीं दिया। इस मुद्दे को खुला रखा गया है।

6. “साल में दो बार” भुगतान

कोर्ट ने साल में दो बार डीए देने के निर्देश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ROPA नियम ऐसी कोई आवृत्ति अनिवार्य नहीं करते हैं, और जो नियमों में नहीं है, उसे अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता।

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निर्णय और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित प्रमुख निर्देश जारी किए:

  1. कानूनी अधिकार: महंगाई भत्ता प्राप्त करना प्रतिवादी-कर्मचारियों के पक्ष में अर्जित एक “कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार” है।
  2. मानक: “मौजूदा परिलब्धियों” (Existing Emoluments) को निर्धारित करने के लिए राज्य को AICPI मानक का पालन करना होगा।
  3. एरियर: कर्मचारी 2008 से 2019 की अवधि के लिए एरियर (बकाया) पाने के हकदार हैं।
  4. समिति का गठन: भुगतान और राज्य के खजाने के संतुलन की निगरानी के लिए एक समिति गठित की गई है, जिसमें शामिल हैं:
    • जस्टिस इंदु मल्होत्रा (सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज) – अध्यक्ष
    • जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस गौतम भादुड़ी (पूर्व हाईकोर्ट जज)
    • भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) (या उनके नामित प्रतिनिधि)

समिति को 6 मार्च, 2026 से पहले कुल राशि और भुगतान अनुसूची निर्धारित करने का कार्य सौंपा गया है। पहली किस्त का भुगतान 31 मार्च, 2026 तक किया जाना अनिवार्य है।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि 16 मई, 2025 के अंतरिम आदेश (जिसमें 25% भुगतान का निर्देश था) का तुरंत पालन किया जाए। सेवानिवृत्त कर्मचारी भी इन लाभों के हकदार होंगे। मामले की अनुपालन रिपोर्ट के लिए अगली सुनवाई 15 अप्रैल, 2026 को तय की गई है।

केस डिटेल्स:

  • केस का नाम: पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य बनाम कन्फेडरेशन ऑफ स्टेट गवर्नमेंट एम्प्लॉइज, पश्चिम बंगाल एवं अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP(C) संख्या 22628-22630/2022 से उद्भूत) (2026 INSC 123)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा
  • अपीलकर्ता (राज्य) के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, हुजेफा अहमदी
  • प्रतिवादी (कर्मचारी) के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, पी.एस. पटवालिया, विकास रंजन भट्टाचार्य, करुणा नंदी

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