“संदेह चाहे कितना भी गहरा हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता”: सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल बाद हत्या के आरोपी को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने गौतम सतनामी की सजा और उम्रकैद के फैसले को रद्द करते हुए कहा है कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों के आधार पर साक्ष्य की श्रृंखला (chain of circumstantial evidence) को पूरी तरह साबित करने में विफल रहा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता ‘संदेह के लाभ’ (benefit of doubt) का हकदार है। कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि उसके खिलाफ सबूत उतने ही कमजोर थे जितने कि उस सह-आरोपी के खिलाफ जिसे ट्रायल कोर्ट पहले ही बरी कर चुका था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जनवरी 2011 में ग्राम धौराभाटा में धुम्मन उर्फ सुरजीत भट्टाचार्य की हत्या से जुड़ा है। मृतक, जो घर में अकेला रहता था, का शव धारदार हथियार से लगी चोटों के साथ बरामद हुआ था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पुरानी दुश्मनी के चलते गौतम सतनामी (अपीलकर्ता) और द्वारिका जांगड़े (आरोपी नंबर 2) ने मिलकर उसकी हत्या की।

राजनांदगांव की ट्रायल कोर्ट ने द्वारिका जांगड़े को तो बरी कर दिया था, लेकिन सतनामी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 2017 में इस सजा को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री ए. सिराजुद्दीन ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष घटना के “सही उद्गम और उत्पत्ति” (true origin and genesis) को साबित करने में विफल रहा। उन्होंने बताया कि जब्ती के गवाह मुकर गए और घटनास्थल से अपीलकर्ता का ड्राइविंग लाइसेंस मिलने की बात भी संदिग्ध है क्योंकि इसका उल्लेख मूल आरोप-पत्र (charge-sheet) में नहीं था। उन्होंने ‘समानता के सिद्धांत’ (principle of parity) पर जोर देते हुए कहा कि जब सह-आरोपी को उन्हीं सबूतों पर बरी कर दिया गया, तो अपीलकर्ता को सजा देना गलत है।

वहीं, छत्तीसगढ़ राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल श्री प्रनीत प्रणव ने दलील दी कि साक्ष्यों की कड़ी पूरी है। उन्होंने ‘आखिरी बार देखे जाने’ (last-seen) की गवाही, खून से सने कुल्हाड़ी और कपड़ों की बरामदगी, तथा मौके पर ड्राइविंग लाइसेंस की मौजूदगी को पुख्ता सबूत बताया।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने शरद बिरधी चंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) मामले में निर्धारित परिस्थितियों के आधार पर साक्ष्य के पांच ‘सुनहरे सिद्धांतों’ की कसौटी पर इस मामले को परखा। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का मामला कई स्तरों पर कमजोर था:

1. ‘लास्ट-सीन’ गवाही की विश्वसनीयता कोर्ट ने राजा राम (PW-4) की गवाही पर सवाल उठाए, जिसने दावा किया था कि उसने घटना की रात आरोपी को कुल्हाड़ी के साथ मृतक के घर के पास देखा था। कोर्ट ने कहा कि पहचान अंधेरे में केवल मोटरसाइकिल की हेडलाइट की रोशनी में की गई थी। इसके अलावा, राजा राम की अपीलकर्ता के साथ पुरानी रंजिश भी थी, जिससे उसे एक ‘हितबद्ध गवाह’ (interested witness) माना जा सकता है।

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“राजा राम के एक हितबद्ध गवाह होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है, और स्वतंत्र पुष्टि के बिना उसकी गवाही सजा को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

2. फॉरेंसिक साक्ष्यों की कमी एफएसएल (FSL) रिपोर्ट ने कुल्हाड़ी और कपड़ों पर मानव रक्त होने की पुष्टि तो की, लेकिन खून के ग्रुप का मिलान नहीं हो सका। कुल्हाड़ी पर मिले बाल मृतक के ही थे, यह भी वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कुल्हाड़ी को डॉक्टर को दिखाकर यह राय नहीं ली गई कि क्या उसी हथियार से मृतक की चोटें संभव थीं।

3. समानता का सिद्धांत (Principle of Parity) पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सह-आरोपी द्वारिका को इसलिए बरी किया क्योंकि उसकी कुल्हाड़ी पर मिला खून मृतक से संबंधित साबित नहीं हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही तर्क अपीलकर्ता पर भी लागू होता है।

“जब दो आरोपियों के खिलाफ समान या एक जैसे चश्मदीद साक्ष्य हों, तो कोर्ट एक को दोषी और दूसरे को बरी नहीं कर सकता… ऐसे मामलों में दोनों आरोपियों पर समानता का सिद्धांत लागू होगा।” (जावेद शौकत अली कुरैशी बनाम गुजरात राज्य का संदर्भ देते हुए)

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4. जब्ती की प्रक्रिया पर संदेह कोर्ट ने ड्राइविंग लाइसेंस की बरामदगी पर भी सवाल उठाए। जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि लाइसेंस आरोप-पत्र के साथ जमा नहीं किया गया था। साथ ही, जब्ती के गवाहों ने गवाही दी कि पुलिस ने उनके हस्ताक्षर मौके पर नहीं बल्कि बाद में लिए थे।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष का मामला शुरुआत में ही विफल हो गया है क्योंकि अपराध के निष्कर्ष तक पहुँचने वाली हर कड़ी साबित नहीं हुई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संदेह कितना भी गहरा हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।

“रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य संदेह पैदा कर सकते हैं, लेकिन संदेह, चाहे वह कितना भी गहरा क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और गौतम सतनामी को धारा 302 IPC के आरोपों से बरी कर दिया।

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: गौतम सतनामी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 1782/2026
  • पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
  • दिनांक: 07 अप्रैल, 2026

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