सार्वजनिक रोजगार कोई पैतृक अधिकार नहीं है: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के चौकीदार नामांकन नियम को असंवैधानिक करार दिया


सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांत को दोहराते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पटना हाईकोर्ट के एक निर्णय को बरकरार रखा है, जिसमें बिहार चौकीदारी संवर्ग नियमावली, 2014 में किए गए संशोधन को रद्द कर दिया गया था। यह संशोधन सेवारत चौकीदार को सेवानिवृत्ति से एक माह पूर्व अपने आश्रित परिजन को नौकरी के लिए नामित करने की अनुमति देता था — जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने “सार्वजनिक रोजगार को पैतृक संपत्ति के रूप में देखने का असंवैधानिक प्रयास” बताया।

यह निर्णय स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 18983/2023, बिहार राज्य दफादार चौकीदार पंचायत (मगध डिवीजन) बनाम बिहार राज्य एवं अन्य में सुनाया गया। निर्णय 2 अप्रैल 2025 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला देवमुनी पासवान (प्रतिवादी संख्या 7) से जुड़ा था, जिनके पिता एक सेवानिवृत्त ग्राम चौकीदार थे। उन्होंने बिहार चौकीदारी संवर्ग (संशोधन) नियमावली, 2014 के तहत अपने पुत्र की नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। लेकिन यह आवेदन सेवानिवृत्ति के बाद किया गया था, जिससे नियम 5(7)(क) का उल्लंघन हुआ, जो कि सेवानिवृत्ति से एक माह पूर्व नामांकन की अनिवार्यता करता है।

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पासवान ने इस अस्वीकृति को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी, पर एकल पीठ ने याचिका खारिज कर दी। उनकी अपील एलपीए संख्या 508/2022 भी खारिज हो गई। हालांकि, हाईकोर्ट ने आगे बढ़ते हुए नियम 5(7)(क) की पूरी उपधारा को ही असंवैधानिक करार दिया और कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती है।

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सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता एक पंजीकृत श्रमिक संघ था — बिहार राज्य दफादार चौकीदार पंचायत (मगध डिवीजन) — जिसकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पक्ष रखा। यह संघ उन मौजूदा चौकीदारों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें 2014 के नियम से लाभ मिल सकता था।

सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रमुख विधिक प्रश्न

  1. क्या हाईकोर्ट ने उस प्रावधान को रद्द करने में त्रुटि की जो औपचारिक रूप से चुनौती का विषय नहीं था?
  2. क्या बिहार चौकीदारी संवर्ग संशोधन नियम, 2014 सार्वजनिक रोजगार में समानता के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है?
  3. क्या वह यूनियन जो हाईकोर्ट में पक्षकार नहीं थी, सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की पात्र थी?
  4. क्या हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेते हुए अधिनियमित नियम को असंवैधानिक घोषित करने का अधिकार था?

न्यायालय के टिप्पणियाँ

न्यायालय ने दशकों की संवैधानिक व्याख्या को स्पष्ट करते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की सराहना की।
न्यायालय ने कहा कि वंशानुगत आधार पर नियुक्तियाँ “योग्यता आधारित प्रणाली” के खिलाफ हैं, जो अनुच्छेद 16 में सुनिश्चित की गई है।

“जब हम संविधान के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे हैं… तब भी कुछ राज्य ऐसे पुराने मॉडल अपना रहे हैं, मानो सरकारी नौकरी कोई पैतृक अधिकार हो।”

न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णयों गज़ुला दसरथ राम राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (AIR 1961 SC 564) और योगेंद्र पाल सिंह बनाम भारत संघ (1987) 1 SCC 631 का हवाला देते हुए कहा कि वंश आधारित नियुक्तियाँ असंवैधानिक हैं, सिवाय उन मामलों के जहां मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियोजन की स्कीम हो।

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कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा:

“बिहार राज्य द्वारा संवैधानिक प्रावधानों को नजरअंदाज करते हुए कुछ चुनिंदा चौकीदारों को लाभ पहुँचाना… उन हज़ारों लोगों के साथ अन्याय है जो ईमानदारी से सरकारी नौकरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

न्यायालय ने यह भी कहा:

“यह मान लेना कि केवल वर्तमान चौकीदारों के बच्चे ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चौकीदारी की नौकरी करने में रुचि रखते हैं, यह बिना किसी आँकड़े के किया गया अनुमान है।”

हाईकोर्ट द्वारा नियम रद्द करने का अधिकार

याचिकाकर्ता का एक बड़ा तर्क यह था कि नियम 5(7)(क) को स्वतः संज्ञान लेते हुए रद्द किया गया, जबकि वह चुनौती का विषय नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा:

“रिट न्यायालयों का दायित्व केवल याचिकाकर्ता के अधिकारों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि अन्य नागरिकों के मूल अधिकारों के उल्लंघन से भी बचाव करना है।”

हालांकि न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि ऐसे अधिकार का प्रयोग “दुर्लभ और असाधारण” मामलों में ही होना चाहिए और यह केवल अधीनस्थ विधि (subordinate legislation) पर लागू होता है, न कि प्राथमिक कानूनों पर।

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यूनियन की पात्रता और प्राकृतिक न्याय

संघ का तर्क था कि उसके सदस्यों को हाईकोर्ट में सुना नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया:

“संघ के किसी भी सदस्य का कोई प्रवर्तनीय अधिकार (enforceable right) नहीं है। जब मूल प्रावधान ही असंवैधानिक है, तो उनका दावा स्वतः ही समाप्त हो जाता है।”

इसके अलावा, यह तथ्य भी निर्णायक रहा कि स्वयं राज्य सरकार (प्रतिवादी संख्या 1) ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी थी।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पटना हाईकोर्ट का निर्णय न्यायसंगत था। संबंधित उपधारा अनुच्छेद 16 का उल्लंघन करती थी, न्यायसंगत वर्गीकरण की कसौटी पर विफल थी, और वंशानुगत आधार पर सार्वजनिक सेवा में प्रवेश को अनुचित रूप से सीमित करती थी।

“सार्वजनिक रोजगार योग्यता और निष्पक्ष चयन पर आधारित होना चाहिए, वंश या विरासत पर नहीं।”

अतः, स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज कर दिया गया।

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