सेक्शन 319 CrPC के तहत सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ‘मिनी-ट्रायल’ न करे: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के मामले में अतिरिक्त आरोपियों को समन जारी करने से इनकार करने वाले ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेशों को रद्द कर दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग करते समय अदालतों को गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियों का ‘मिनी-ट्रायल’ या गहराई से विश्लेषण नहीं करना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 22 अगस्त 2017 को मुजफ्फरनगर के कोतवाली नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। शिकायतकर्ता मोहम्मद कलीम (PW-1) के अनुसार, जब वह अपने सहयोगी मोहम्मद अम्मार के साथ कोर्ट जा रहे थे, तब अम्मार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। FIR में आरोप लगाया गया था कि यह हत्या जेल में बंद कुछ अपराधियों और बाहर मौजूद उनके सहयोगियों द्वारा रची गई एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी।

मामले की सुनवाई के दौरान गवाह खलील (PW-6) और ताज़ीम (PW-7) के बयानों के बाद, शिकायतकर्ता ने धारा 319 CrPC के तहत राजेंद्र और मौसम नामक दो व्यक्तियों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन करने के लिए आवेदन किया। आरोप था कि इन दोनों ने घटना से करीब 15 दिन पहले जेल में साजिशकर्ताओं से मुलाकात की थी।

निचली अदालतों का निष्कर्ष

ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2011 को इस आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित आधार बताए थे:

  • गवाहों के बयानों में अंतर: PW-1, PW-6 और PW-7 के बयानों में इस बात को लेकर विरोधाभास था कि राजेंद्र और मौसम ने जेल में किन-किन आरोपियों से मुलाकात की थी।
  • साक्ष्यों का अभाव: जेल रजिस्टर में ऐसी किसी मुलाकात का रिकॉर्ड न होना।
  • घटना की संभावना पर सवाल: कोर्ट ने इस बात पर संदेह जताया कि मृतक के साथ स्कूटर पर पीछे बैठे शिकायतकर्ता को एक भी गोली क्यों नहीं लगी, जबकि हमलावरों ने पांच राउंड फायरिंग की थी।
  • अस्पताल और मार्ग संबंधी विसंगतियां: गवाहों द्वारा बताए गए रास्ते और मृतक को अस्पताल ले जाने वाले व्यक्ति की पहचान पर भी सवाल उठाए गए थे।
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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही के विभिन्न चरणों में आवश्यक साक्ष्यों के मानकों को स्पष्ट किया:

  1. प्रथम दृष्टया मानक (Prima Facie Standard): औपचारिक आरोप तय करने के लिए आवश्यक।
  2. ठोस और पुख्ता मानक (Strong and Cogent Standard): धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त आरोपियों को समन करने के लिए आवश्यक।
  3. संदेह से परे प्रमाण (Beyond Reasonable Doubt): दोषसिद्धि (Conviction) के लिए आवश्यक।

जस्टिस संजय करोल ने फैसले में उल्लेख किया कि ट्रायल कोर्ट ने अत्यधिक सख्त मानक अपनाकर खुद को गलत दिशा में निर्देशित किया। कोर्ट ने कहा:

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“ट्रायल कोर्ट ने इस संबंध में खुद को गलत दिशा में निर्देशित किया है। गवाहों के बयानों के बीच मामूली विरोधाभासों और इस तरह के संभावना के मुद्दों का मूल्यांकन करने में कि क्या शिकायतकर्ता चोट से बच सकता था, कोर्ट ने आवश्यकता से अधिक सख्त मानक लागू किया।”

पीठ ने निचली अदालतों द्वारा साक्ष्यों को टुकड़ों में देखने के दृष्टिकोण की भी आलोचना की:

“ट्रायल कोर्ट ने प्रत्येक विसंगति को अलग-थलग करके देखा, बजाय इसके कि सभी गवाहों और परिस्थितियों के संचयी प्रभाव (Cumulative Weight) का आकलन किया जाता… कोर्ट ने प्री-ट्रायल जांच के निर्धारित दायरे का उल्लंघन किया, मामूली विसंगतियों पर अत्यधिक जोर दिया और साक्ष्यों की सामूहिक शक्ति पर पूरी तरह विचार नहीं किया।”

कोर्ट ने आगे कहा कि मौखिक गवाही, यदि विश्वसनीय हो, तो वह अकेले ही समन करने के लिए पर्याप्त हो सकती है और इसके लिए दस्तावेजी पुष्टि (जैसे जेल रिकॉर्ड) की अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

अदालत ने माना कि तीन गवाहों (PW-1, PW-6 और PW-7) की शपथ पर दी गई गवाही इस मामले के तथ्यों में ‘ठोस और पुख्ता सबूत’ के मानक को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि राजेंद्र और मौसम को अतिरिक्त आरोपी के रूप में पेश किया जाए और कानून के अनुसार उनके खिलाफ कार्यवाही की जाए। ट्रायल कोर्ट को आवश्यक कार्रवाई के लिए इस आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: मोहम्मद कलीम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: SLP (Crl.) No. 11085 of 2023 से उत्पन्न
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • फैसले की तारीख: 17 मार्च, 2026

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