भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया है कि एक सत्र न्यायालय भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के अंतर्गत किसी अतिरिक्त अभियुक्त को केवल अभियोजन साक्षी की मुख्य परीक्षा के आधार पर तलब कर सकता है और इसके लिए जिरह की प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है, यदि मुख्य परीक्षा में अभियुक्त की संलिप्तता इतनी स्पष्ट हो कि उस पर मुकदमा चलाया जाना न्यायसंगत हो। न्यायालय ने यह टिप्पणी सतबीर सिंह बनाम राजेश कुमार एवं अन्य [क्रिमिनल अपील संख्या 1487/2025] में अपील स्वीकार करते हुए की, और सत्र न्यायाधीश के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें दो अन्य व्यक्तियों को हत्या के प्रयास के लिए मुकदमे का सामना करने हेतु तलब किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 9 फरवरी 2020 को हरियाणा के करनाल जिले के रसूलपुर खुर्द गांव में एक वॉलीबॉल मैच के दौरान हुई हिंसक झड़प से जुड़ा है। अपीलकर्ता सतबीर सिंह, जो कि सेना में कार्यरत हैं और अवकाश पर घर आए थे, उनकी कमर और सीने में चाकू से वार कर गंभीर रूप से घायल कर दिया गया था—एक वार से उनके फेफड़े भी क्षतिग्रस्त हुए थे। प्रारंभ में, इसी घटना में घायल हुए मुकेश के बयान के आधार पर सतबीर सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
हालाँकि, 14 फरवरी 2020 को जब सतबीर को होश आया, तो उन्होंने एक बयान में कहा कि उन पर मुकेश ने हमला किया था, और इसमें नीरज, सागर उर्फ बिट्टू और अंकित ने सहायता की थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि राजेश कुमार ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी:

“चाकू मार के तसल्ली कर दी, अगर दोबारा ज़िंदा गाँव में आएगा तो मैं गोली से उड़ा दूंगा।”
इस बयान के आधार पर सतबीर सिंह ने करनाल के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष धारा 319 CrPC के तहत एक याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने राजेश, नीरज, सागर और अंकित को सह-आरोपी के रूप में तलब करने की मांग की। 13 सितंबर 2021 को सत्र न्यायालय ने यह याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें मुकदमे का सामना करने का निर्देश दिया।
लेकिन राजेश और अन्य ने इस आदेश को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने चिकित्सा साक्ष्य और पुलिस जांचों के अभाव में आरोपों की पुष्टि न होने के आधार पर सम्मन आदेश को रद्द कर दिया।
कानूनी प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट में अपील के दौरान निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रश्न उठे:
- क्या केवल मुख्य परीक्षा के आधार पर, जिरह की प्रतीक्षा किए बिना, सत्र न्यायालय धारा 319 CrPC के अंतर्गत अतिरिक्त अभियुक्त को तलब कर सकता है?
- धारा 319 CrPC को लागू करते समय न्यायालय को किस स्तर की संतुष्टि प्राप्त करनी चाहिए?
- क्या पुलिस जांच और डीएसपी स्तर की पूछताछें, सत्र न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति पर प्रभाव डाल सकती हैं?
- क्या हाईकोर्ट ने धारा 397 CrPC के तहत अपनी पुनरीक्षणीय क्षेत्राधिकार की सीमाएं लांघीं?
सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत तर्क
अपीलकर्ता सतबीर सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नीरज कुमार जैन ने तर्क दिया कि सत्र न्यायाधीश ने पीड़ित (PW-1) की गवाही का सही मूल्यांकन किया और धारा 319 CrPC के तहत आवश्यक संतोषजनक आधार रिकॉर्ड किया।
वहीं, प्रतिवादी राजेश कुमार और नीरज की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री गगन गुप्ता ने तर्क दिया कि तीन डीएसपी और एसएचओ ने उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं पाया, फिर भी सत्र न्यायालय ने उन्हें तलब किया जो त्रुटिपूर्ण है।
हरियाणा राज्य ने एक प्रतिज्ञापत्र दाखिल कर इस सम्मन पर कोई आपत्ति नहीं जताई और इसे न्यायालय के विवेक पर छोड़ दिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और प्रमुख टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का हस्तक्षेप अनुचित था और सत्र न्यायाधीश ने कानून के दायरे में रहते हुए निर्णय लिया।
न्यायालय ने हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य, (2014) 3 SCC 92 में संविधान पीठ द्वारा स्थापित सिद्धांतों की पुष्टि की, विशेष रूप से यह बात:
“धारा 319 CrPC के अंतर्गत ‘साक्ष्य’ शब्द का व्यापक अर्थ में उपयोग किया जाना चाहिए, जिसमें मुख्य परीक्षा भी शामिल है, और न्यायालय को जिरह की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने जितेन्द्र नाथ मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (2023) 7 SCC 344 से भी उद्धरण देते हुए कहा:
“धारा 319 CrPC के तहत शक्ति का प्रयोग करते समय न्यायालय को यंत्रवत नहीं चलना चाहिए… संतोष का स्तर केवल प्रथम दृष्टया से अधिक होना चाहिए, परंतु इतनी भी नहीं कि बिना खंडन किए वह दोष सिद्धि का आधार बन जाए।”
इस कसौटी को लागू करते हुए, न्यायालय ने पाया कि सत्र न्यायाधीश ने न्यायसंगत विवेक का प्रयोग किया, विशेष रूप से जब नीरज पर आरोप था कि उसने हमले के दौरान पीड़ित को पकड़ा और राजेश कुमार ने हत्या की धमकी दी।
“सत्र न्यायालय का निष्कर्ष एक संभाव्य निष्कर्ष था, कोई ऐसा विचित्र या अवैध नहीं था, जिसे हाईकोर्ट द्वारा रद्द किया जाना चाहिए था,” कोर्ट ने कहा।
अतः सुप्रीम कोर्ट ने यह पाते हुए कि हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षणीय अधिकार क्षेत्र का गलत उपयोग किया, अपील स्वीकार की, 7 मार्च 2024 को पारित हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और सत्र न्यायाधीश के सम्मन आदेश को बहाल कर दिया।
अंत में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणियाँ केवल इस अपील के निर्णय तक सीमित होंगी और मुकदमे को प्रभावित नहीं करेंगी।
“सत्र न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के अनुसार इस मुकदमे को शीघ्रातिशीघ्र अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाएं,” पीठ ने निष्कर्ष में कहा।
प्रकरण विवरण:
- मामले का नाम: सतबीर सिंह बनाम राजेश कुमार एवं अन्य
- मामला संख्या: आपराधिक अपील संख्या 1487 / 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति मनमोहन
- अपीलकर्ता के वकील: श्री नीरज कुमार जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता
- प्रतिवादी के वकील: श्री गगन गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता