सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्तियों के लिए ही आरक्षित है। यदि कोई व्यक्ति ईसाई जैसे किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो वह अपना अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है। इसके परिणामस्वरूप, ऐसा व्यक्ति ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ (Atrocities Act) के तहत मिलने वाले लाभों या सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या मूल रूप से अनुसूचित जाति से संबंधित कोई व्यक्ति, हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने के बाद भी उस दर्जे के लाभ प्राप्त करना जारी रख सकता है। जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म अपनाने से व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है। ऐसे में, वे व्यक्ति एट्रोसिटी एक्ट के प्रावधानों का सहारा लेने के पात्र नहीं रह जाते।
बेंच ने अपने विस्तृत अवलोकन में उन धार्मिक मानदंडों पर जोर दिया, जो अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचे में निहित हैं। कोर्ट ने उल्लेख किया कि कानून के अनुसार अनुसूचित जातियों की पहचान विशिष्ट धार्मिक संबद्धताओं के साथ जुड़ी हुई है।
बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुसूचित जाति की सदस्यता केवल उन लोगों तक सीमित है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानते हैं। किसी भी अन्य पंथ को अपनाने से इस दर्जे का परित्याग हो जाता है।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि एट्रोसिटी एक्ट के तहत प्रदान की जाने वाली सुरक्षा विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो इस मान्यता प्राप्त दायरे के भीतर अपनी पहचान बनाए रखते हैं। इसलिए, ईसाई धर्म अपनाने वाला कोई दलित व्यक्ति कानून की नजर में अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा और कानूनी कार्यवाही में इस अधिनियम को लागू करने की मांग नहीं कर सकता।

