“कानूनी प्रक्रिया ही सजा न बन जाए”; SC/ST एक्ट के तहत अपराध के लिए पीड़ित की जाति का ‘ज्ञान’ होना अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह स्थापित करना अनिवार्य है कि आरोपी को इस बात का “ज्ञान” था कि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह की पीठ ने डॉ. आनंद राय के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह साबित करने में विफल रही कि आरोपी को पीड़ित की जाति के बारे में जानकारी थी। हालांकि, पीठ ने मामले को भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अन्य अपराधों के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “बिना किसी प्रथम दृष्टया मामले के कार्यवाही को आगे बढ़ाने की अनुमति देना किसी व्यक्ति को बिना किसी कानूनी आवश्यकता के आपराधिक कार्यवाही के तनाव, कलंक और अनिश्चितता के संपर्क में लाना है। अगर इस जिम्मेदारी का सावधानी से पालन नहीं किया गया, तो यह प्रक्रिया स्वयं ही सजा बन सकती है।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) के 3 जुलाई 2025 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें हाईकोर्ट ने आरोपों को तय करने के खिलाफ अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी थी। मामला 15 नवंबर 2022 को रतलाम जिले के बिलपांक पुलिस थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से संबंधित है।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा के अनावरण के लिए बछड़ापारा में एक बड़ी भीड़ जमा हुई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि ‘जेएवाईएस’ (JAYS) संगठन के सदस्यों ने सरकारी अधिकारियों के वाहनों को रोका, हाथापाई की और पथराव किया, जिससे सुरक्षाकर्मियों को चोटें आईं। इस घटना में अन्य लोगों के साथ अपीलकर्ता का नाम भी एफआईआर में दर्ज किया गया था।

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जांच पूरी होने के बाद, विशेष न्यायाधीश ने आईपीसी की धारा 147, 341, 427, 353, 332, 333, 326, 323, 352 (पठित धारा 149) और SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत आरोप तय किए। आरोपी ने CrPC की धारा 227 के तहत आरोप मुक्त (Discharge) करने के लिए आवेदन किया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने केवल आंशिक रूप से स्वीकार किया था, और हाईकोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा था।

कानूनी तर्क और दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य चुनौती केवल SC/ST एक्ट के तहत आरोपों की वैधता को लेकर थी। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि अधिनियम के तहत अपराध के लिए आवश्यक तत्व गायब थे। विशेष रूप से, यह कहा गया कि एफआईआर और फाइनल रिपोर्ट में किसी भी अपमानजनक या जातिसूचक शब्द के उपयोग का उल्लेख नहीं था, और न ही यह कहा गया था कि आरोपी को पीड़ित की जाति का ज्ञान था।

अपीलकर्ता ने जोर देकर कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत आरोप तय करने के लिए, अभियोजन पक्ष को यह दिखाना होगा कि अपराध इस ज्ञान के साथ किया गया था कि पीड़ित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में एक स्पष्ट विरोधाभास पाया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) (जानबूझकर अपमान और गाली-गलौज) के तहत बरी कर दिया था क्योंकि किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया था कि किस आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने उन्हीं सबूतों के आधार पर धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत आरोप तय कर दिए।

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फैसला लिखते हुए न्यायमूर्ति करोल ने कहा:

“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि जब ट्रायल कोर्ट ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि धारा 161 CrPC के तहत किसी भी बयान में यह नहीं कहा गया है कि आरोपी ने अपमानित करने या जान से मारने की धमकी देने के इरादे से जातिसूचक शब्द कहे, तो फिर उसी साक्ष्य के आधार पर यह कैसे निष्कर्ष निकाला गया कि आरोपी के कृत्य जातिगत जागरूकता से प्रेरित थे।”

पीठ ने माना कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे यह स्थापित हो सके कि आरोपी को पीड़ित की जाति का “ज्ञान” था। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायत में यह कहीं नहीं कहा गया था कि शिकायतकर्ता SC/ST समुदाय का सदस्य है।

अदालत ने स्पष्ट किया, “एक बार जब कथित अपराधी की ओर से ‘ज्ञान’ (knowledge) होने पर सवाल खड़ा हो जाता है, तो यह निश्चित है कि आरोप टिक नहीं सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की भी आलोचना की कि उसने SC/ST एक्ट की धारा 14-A के तहत अपनी अपीलीय शक्तियों का सही प्रयोग नहीं किया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट को केवल यांत्रिक तरीके से निचली अदालत के आदेश की पुष्टि नहीं करनी चाहिए थी, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए था।

“विशेष न्यायालय के आदेश की यांत्रिक पुष्टि, बिना स्वतंत्र जांच के, स्थापित अपीलीय न्यायशास्त्र के असंगत होगी और यह क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में विफलता मानी जाएगी।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत तय किए गए आरोपों को रद्द कर दिया। हालांकि, मामले को भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आरोपों पर सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया गया है।

केस डिटेल्स:

केस टाइटल: डॉ. आनंद राय बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य

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केस नंबर: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl.) नंबर 10711 ऑफ 2025 से उद्भूत)

कोरम: न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह

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