सुप्रीम कोर्ट ने कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर (Cr.P.C.) की धारा 197 के तहत सुरक्षा की मांग करने वाले दो पुलिस अधिकारियों की अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधीनस्थ अधिकारियों को अभियोजन से छूट देने वाली सरकारी अधिसूचना उस वैध संज्ञान (cognisance) आदेश को शून्य नहीं कर सकती, जो अधिसूचना जारी होने से वर्षों पहले पारित किया गया था।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि सरकारी मंजूरी के बिना संज्ञान लेने पर रोक उस चरण पर लागू होती है जब अदालत पहली बार अपराध पर विचार करती है। यदि संज्ञान की तारीख पर ऐसी कोई रोक नहीं थी, तो बाद की प्रशासनिक अधिसूचनाएं कानूनी कार्यवाही को पीछे जाकर नहीं रोक सकतीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 2001 में श्रीमती साधना दास द्वारा दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था। इसमें आरोप लगाया गया था कि उनके पति की हत्या तीन पुलिस अधिकारियों—शंकरन मोइत्रा (असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस), एस.एम. कुंडू (थाना प्रभारी) और सुधीर सिकदार (कांस्टेबल) ने की थी। यह घटना पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान लाठीचार्ज के समय हुई थी।
प्रारंभ में, मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेते हुए आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 302, 201, 109 और 120-B के तहत तलब किया था। उच्च पदस्थ अधिकारी होने के कारण शंकरन मोइत्रा ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया (शंकरन मोइत्रा बनाम साधना दास), जहाँ धारा 197(1) के तहत आवश्यक मंजूरी न होने के आधार पर उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी।
2006 के उस आदेश के बाद, मजिस्ट्रेट ने अधीनस्थ अपीलकर्ताओं (कुंडू और सिकदार) को भी वही लाभ देते हुए 2007 में कार्यवाही समाप्त कर दी थी। हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2012 में मजिस्ट्रेट के आदेश को पलट दिया और ट्रायल आगे बढ़ाने का निर्देश दिया, जिसके खिलाफ यह अपील सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि भले ही संज्ञान के समय वे अधीनस्थ अधिकारी थे और धारा 197(1) के तहत सुरक्षित नहीं थे, लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने 19 नवंबर 2010 को एक अधिसूचना जारी की थी। Cr.P.C. की धारा 197(3) के तहत जारी इस अधिसूचना ने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में शामिल सभी अधीनस्थ पुलिस रैंकों के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता को अनिवार्य बना दिया था। उनका दावा था कि अब उन्हें बिना राज्य की मंजूरी के अभियोजित नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता ने दलील दी कि 2001 में जब संज्ञान लिया गया था, तब अपीलकर्ताओं को ऐसी कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि 2010 की अधिसूचना केवल उन्हीं मामलों पर लागू होनी चाहिए जहाँ संज्ञान अधिसूचना की तारीख के बाद लिया गया हो।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
कोर्ट ने दो मुख्य मुद्दों पर विचार किया: क्या अपीलकर्ताओं को शंकरन मोइत्रा मामले के फैसले का लाभ मिल सकता है और क्या 2010 की अधिसूचना उन पर लागू होती है।
पहले मुद्दे पर कोर्ट ने नोट किया कि धारा 197(1) केवल उन लोक सेवकों की रक्षा करती है जिन्हें “सरकार की मंजूरी के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता।” नागराज बनाम मैसूर राज्य और फखरुज्जमा बनाम झारखंड राज्य का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा:
“चूंकि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि जब कथित अपराध का संज्ञान लिया गया था, तब अपीलकर्ता अधीनस्थ रैंक के अधिकारी थे… इसलिए Cr.P.C. की धारा 197(1) के तहत मंजूरी की कोई आवश्यकता नहीं थी।”
2010 की अधिसूचना के संबंध में कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 197 के तहत कानूनी रोक “संज्ञान के चरण” पर प्रभावी होती है। खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“संज्ञान के बाद की मंजूरी कार्यवाही को नहीं बचाएगी। कारण सरल है, जब संज्ञान लिया गया था तब वह रोक लागू थी। इसके विपरीत, यदि अपराध का संज्ञान लेने की तारीख पर कोई रोक नहीं है, तो अदालत अपराध के ट्रायल के साथ आगे बढ़ सकती है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“अपराध का संज्ञान लेने की अदालत की शक्ति पर बाद में लगाई गई रोक उन कार्यवाहियों के लिए कोई मायने नहीं रखती जहाँ संज्ञान तब लिया गया था जब ऐसी कोई रोक नहीं थी। परिणामस्वरूप, अधिसूचना उन कार्यवाहियों को प्रभावित नहीं करेगी जहाँ संज्ञान लेते समय कोई कानूनी बाधा नहीं थी।”
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि संज्ञान वैध रूप से 2001 में लिया गया था—जो 2010 की अधिसूचना से लगभग नौ साल पहले था—इसलिए अपीलकर्ताओं का अभियोजन बाधित नहीं है। कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और सभी अंतरिम आदेशों को वापस ले लिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने हत्या के आरोपों की मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: समरेंद्र नाथ कुंडू और अन्य बनाम साधना दास और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 654/2013
- पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा
- फैसले की तारीख: 01 अप्रैल 2026

