सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी ऋण समझौते या डिबेंचर ट्रस्ट डीड (DTD) में संशोधन के लिए कोई विशिष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, तो केवल अनौपचारिक बातचीत या ईमेल के आधार पर उन शर्तों को बदला हुआ नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने ‘कैटालिस्ट ट्रस्टीशिप लिमिटेड’ (डिबेंचर ट्रस्टी) की अपील स्वीकार करते हुए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के आदेशों को रद्द कर दिया है। इन ट्रिब्यूनल्स ने एक्स्टसी रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने से इनकार कर दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
एक्स्टसी रियल्टी (कॉर्पोरेट ऋणी) ने मुंबई में एक प्रोजेक्ट के लिए ₹850 करोड़ के डिबेंचर जारी किए थे। इसमें से ₹600 करोड़ के डिबेंचर ‘ECL फाइनेंस लिमिटेड’ (ECLF) और एडलवाइस समूह की अन्य संस्थाओं ने खरीदे थे। मार्च 2022 में, कंपनी ने ऋण पुनर्गठन (Restructuring) और 18 महीने की मोहलत (Moratorium) के लिए ECLF के साथ बातचीत शुरू की। कंपनी का दावा था कि इस बातचीत के आधार पर उसे मोहलत मिल गई है। हालांकि, डिबेंचर ट्रस्टी ने डिफॉल्ट होने पर ₹1203.55 करोड़ की वसूली का नोटिस जारी कर दिया, क्योंकि 94.84% डिबेंचर धारकों ने इस पुनर्गठन प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
निचली अदालतों का निष्कर्ष
NCLT और NCLAT ने डिबेंचर ट्रस्टी की धारा 7 के तहत दी गई अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बातचीत के आधार पर पहले से ही मोहलत प्रभावी थी। NCLAT ने यहाँ तक टिप्पणी की थी कि डिबेंचर ट्रस्टी ने कंपनी को दिवालिया करने के लिए जानबूझकर ‘डिफॉल्ट’ की स्थिति पैदा की।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि दोनों ट्रिब्यूनल्स ने कानून और तथ्यों को समझने में गंभीर त्रुटि की है। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां निम्नलिखित हैं:
1. डीड की प्रक्रिया का उल्लंघन कोर्ट ने कहा कि डिबेंचर ट्रस्ट डीड की धारा 33 के अनुसार, किसी भी संशोधन के लिए 75% बहुमत वाले डिबेंचर धारकों की लिखित सहमति अनिवार्य थी। कंपनी केवल एक लेनदार (ECLF) के साथ बातचीत कर रही थी, जो अन्य सभी डिबेंचर धारकों को बाध्य नहीं कर सकती थी।
2. दिवाला कानून का सिद्धांत पीठ ने ‘इनोवेटिव इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम आईसीआईसीआई बैंक (2018)’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 7 के तहत, निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) को केवल यह देखना होता है कि क्या वित्तीय ऋण मौजूद है और क्या उसमें डिफॉल्ट हुआ है। कोर्ट ने कहा:
“अधिनिर्णायक प्राधिकारी को केवल सूचना उपयोगिता के रिकॉर्ड या वित्तीय लेनदार द्वारा प्रस्तुत अन्य साक्ष्यों को देखना होता है ताकि वह स्वयं को संतुष्ट कर सके कि डिफॉल्ट हुआ है। यह मायने नहीं रखता कि ऋण विवादित है, जब तक कि ऋण ‘देय’ है…”
3. डिबेंचर ट्रस्टी की भूमिका NCLAT द्वारा ट्रस्टी पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ट्रस्टी का कर्तव्य डिबेंचर धारकों के हितों की रक्षा करना है, न कि ऋणी कंपनी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यह निष्कर्ष कि डिबेंचर ट्रस्टी ने डिबेंचर धारकों के साथ मिलकर प्रतिवादी कंपनी को दिवालियापन की ओर खींचने के लिए संदिग्ध योजना बनाई, गलत है। डिबेंचर ट्रस्टी के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया जाता है।”
4. ट्रिब्यूनल्स के फैसले ‘विकृत’ (Perverse) आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट ट्रिब्यूनल्स के समान निष्कर्षों में हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन इस मामले में कोर्ट ने कहा:
“हमें वर्तमान मामला ऐसा लगता है, जहां NCLT और NCLAT द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों की विकृति स्पष्ट और प्रत्यक्ष है… उन्होंने डिबेंचर ट्रस्ट डीड की बाध्यकारी शर्तों को नजरअंदाज करने और अनुमानों एवं धारणाओं के आधार पर शर्तों को फिर से तैयार करने में गलती की है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि एक्स्टसी रियल्टी के खिलाफ धारा 7 की याचिका (CP (IB) 922/MB/C-I/2022) को NCLT मुंबई द्वारा एक अलग आदेश के माध्यम से स्वीकार किया जाए और कानून के अनुसार आगे की कार्यवाही शुरू की जाए।
केस का विवरण: केस का शीर्षक: कैटालिस्ट ट्रस्टीशिप लिमिटेड बनाम एक्स्टसी रियल्टी प्राइवेट लिमिटेड
केस संख्या: सिविल अपील संख्या 7424/2025

