सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में कथित अवैध निर्माण और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से जुड़े मामले में CBI को अभियोजन की स्वीकृति दिए जाने को चुनौती देने वाली एक भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि अधिकारी स्वीकृति के खिलाफ आगे बहस करते हैं तो अदालत आरोप तय करने का निर्देश भी दे सकती है। पीठ की इस टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस ले ली।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि पेड़ों की कटाई को “बोना फाइड फेलिंग” के रूप में दिखाया गया है और पूछा कि क्या यह आपराधिक कृत्य नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे “मामले को यहीं समाप्त करें”, अन्यथा अदालत यह दर्ज कर सकती है कि यह आरोप तय करने के लिए उपयुक्त मामला है।
यह अधिकारी कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पूर्व निदेशक रह चुके हैं और उनके खिलाफ राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण और बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई को लेकर CBI जांच चल रही है।
इस प्रकरण में पहले भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही हो चुकी है। 11 नवंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने अवमानना कार्यवाही बंद कर दी थी, जब अधिकारी ने बिना शर्त माफी मांगी थी। उन्होंने अभियोजन पर रोक के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जबकि मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन था।
इससे पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दी गई अभियोजन स्वीकृति पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2025 को इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पूछा था कि जब मामला उसके समक्ष लंबित था, तब हाईकोर्ट ने ऐसा आदेश कैसे पारित किया।
शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई थी, न्यायिक अभिलेख अपने पास मंगा लिए थे और अधिकारी को अवमानना नोटिस जारी किया था। बाद में उनकी बिना शर्त माफी, 21 वर्षों की “निर्दोष सेवा” और भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें क्षमा कर दिया गया।
याचिका वापस लेने के साथ ही अभियोजन स्वीकृति को दी गई चुनौती समाप्त हो गई है, जिससे कॉर्बेट अवैध कटान और निर्माण मामले में आपराधिक कार्यवाही आगे बढ़ने का मार्ग साफ हो गया है।

