सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला को लग्ज़री होटल सैलून में “गलत हेयरकट” के लिए उपभोक्ता आयोग द्वारा दिए गए ₹2 करोड़ के मुआवज़े को घटाकर ₹25 लाख कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि उपभोक्ता मामलों में भारी भरकम मुआवज़ा केवल आरोपों या भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही दिया जा सकता है।
न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने 6 फरवरी को दिए फैसले में कहा:
“सिर्फ अनुमान या शिकायतकर्ता की कल्पना के आधार पर हर्जाना नहीं दिया जा सकता। जब मुआवज़े की मांग करोड़ों रुपये की हो, तो विश्वसनीय और भरोसेमंद सबूत प्रस्तुत करना अनिवार्य है।”
मामला अप्रैल 2018 का है जब प्रबंधन क्षेत्र में काम करने वाली आशना रॉय दिल्ली स्थित आईटीसी मौर्य होटल के सैलून गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि हेयरस्टाइलिस्ट ने उनकी इच्छा के विरुद्ध बाल बहुत छोटे काट दिए, जिससे उन्हें मानसिक आघात पहुँचा और कई मॉडलिंग व करियर अवसर हाथ से निकल गए।
इस आधार पर राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने उन्हें ₹2 करोड़ का मुआवज़ा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस मुआवज़े की दोबारा समीक्षा करने का निर्देश दिया था, जिसके बाद भी आयोग ने अप्रैल 2023 में ₹2 करोड़ की राशि बरकरार रखी। इसके बाद ITC लिमिटेड ने इसे चुनौती दी।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा जो दस्तावेज़ दिए गए थे, वे केवल फोटोकॉपी थे और उनमें विसंगतियाँ थीं।
“यह कहना कि मानसिक आघात के कारण शिकायतकर्ता ने मूल दस्तावेज़ नहीं संभाले होंगे, इसलिए केवल फोटोकॉपी पर भरोसा किया जा सकता है — इतना बड़ा मुआवज़ा देने का आधार नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि
“सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की सख्ती लागू न होने के बावजूद, आयोग ने यह आकलन नहीं किया कि शिकायतकर्ता को ₹2 करोड़ की हानि कैसे हुई। केवल सामान्य चर्चा से इतनी बड़ी राशि का औचित्य नहीं ठहराया जा सकता।”
कोर्ट ने माना कि सेवा में कमी हुई थी, लेकिन ₹2 करोड़ के मुआवज़े को असंवैधानिक और साक्ष्यविहीन मानते हुए इसे ₹25 लाख कर दिया।

