यदि पीड़िता का बयान अदालत में भरोसा पैदा न करे, तो केवल उसके आधार पर सजा नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार की सजा को रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने सामूहिक बलात्कार के दो आरोपियों की सजा को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया है कि हालांकि बलात्कार के मामलों में केवल पीड़िता (प्रोसक्यूट्रिक्स) के बयान के आधार पर सजा दी जा सकती है, लेकिन ऐसा बयान भरोसेमंद और अदालत का विश्वास जीतने वाला होना चाहिए। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में अत्यधिक देरी और पीड़िता के बयानों में मौजूद विरोधाभासों के कारण अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 7 अप्रैल 1998 का है, जब देहरादून में पीड़िता ने आरोप लगाया कि बाजार से घर लौटते समय राजेंद्र, पप्पू उर्फ हनुमान, सुशील कुमार और किशन ने उसे रोक लिया। आरोप के अनुसार, आरोपियों ने उसका मुंह दबाकर उसे एक प्लॉट पर ले जाकर बारी-बारी से बलात्कार किया।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि घटना के 3 महीने और 24 दिन बाद यानी 31 जुलाई 1998 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने साल 2000 में चारों आरोपियों को आईपीसी की धारा 376(2)(g) और 506 के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। साल 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान दो आरोपियों की मृत्यु हो गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। साथ ही, पीड़िता के बयानों में कई विसंगतियां थीं, जैसे कि घटना स्थल (कमरा या खुला प्लॉट) और उसके घर से उस स्थान की दूरी। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि “पानी के विवाद” के कारण पुरानी रंजिश के चलते उन्हें झूठा फंसाया गया है।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने दलील दी कि बलात्कार के कृत्य को लेकर पीड़िता का बयान सुसंगत था और आरोपियों की धमकियों के कारण “शर्म और डर” की वजह से शिकायत दर्ज कराने में देरी हुई।

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अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा पेश किया गया पक्ष “एक व्यक्ति के स्वाभाविक व्यवहार के विपरीत” था। पीठ ने गौर किया कि पीड़िता ने कई महीनों तक अपने पति या परिवार को इस बारे में कुछ नहीं बताया और केवल एक अनजान महिला को इसकी जानकारी दी, जिसकी गवाही कभी दर्ज ही नहीं की गई।

अदालत ने चार मुख्य खामियों को रेखांकित किया:

  1. देरी का स्पष्टीकरण न होना: एफआईआर दर्ज कराने में 3 महीने और 24 दिन की देरी के पीछे कोई ठोस वजह नहीं बताई गई।
  2. पुष्टि का अभाव: अदालत में कोई मेडिकल साक्ष्य या सहायक गवाह पेश नहीं किया गया।
  3. बयानों में विरोधाभास: एफआईआर और सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयान में घटना स्थल को लेकर भारी अंतर था।
  4. पुरानी रंजिश: निचली अदालतों ने पक्षों के बीच पहले से चल रहे विवाद और रंजिश के पहलू पर ठीक से विचार नहीं किया।
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पीठ ने विजयन बनाम केरल राज्य (2008) 14 SCC 763 के फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने कहा था कि जब एफआईआर में लंबी देरी हो और मेडिकल रिपोर्ट जैसा कोई सहायक साक्ष्य न हो, तो केवल पीड़िता के बयान पर आरोपी को दोषी ठहराना “बेहद खतरनाक” है।

अदालत ने टिप्पणी की:

“वर्तमान मामले में, पीड़िता का बयान इस अदालत का विश्वास जीतने में पूरी तरह विफल रहता है… रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री स्पष्ट रूप से आरोपी की संलिप्तता स्थापित नहीं करती है और अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया है।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने जीवित बचे अपीलकर्ताओं, राजेंद्र और पप्पू को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

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केस विवरण:

  • केस शीर्षक: राजेंद्र एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 264/2015
  • पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • फैसले की तारीख: 13 मार्च, 2026

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