सुप्रीम कोर्ट ने एक ही एफआईआर (FIR) और एक ही आदेश से उत्पन्न दो अलग-अलग याचिकाओं को अलग-अलग बेंचों के समक्ष सूचीबद्ध (लिस्ट) करने पर अपनी रजिस्ट्री से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायालय ने निर्देश दिया है कि पूरे तथ्यों को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रखा जाए ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मामलों को एक साथ क्यों नहीं लिस्ट किया गया। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस चूक के लिए “दोषी अधिकारी” की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ अर्शील उर्फ अमान द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट के 15 दिसंबर, 2025 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसके तहत आपराधिक अपील संख्या 10391/2025 में जमानत रद्द कर दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता अर्शील उर्फ अमान ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंतिम फैसले और आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने अपने 15 दिसंबर, 2025 के आदेश के माध्यम से आरोपियों को दी गई जमानत रद्द कर दी थी।
जब यह मामला न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर (कोर्ट नंबर 15) की बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के संज्ञान में यह तथ्य लाया कि इसी मामले में एक सह-अभियुक्त द्वारा दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच के समक्ष पहले से ही लंबित है।
कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव ने दलील दी कि वर्तमान याचिका में “इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक अपील संख्या 10391/2025 में पारित उसी आदेश” को चुनौती दी गई है।
वकील ने बेंच को सूचित किया कि इसी आदेश के खिलाफ एक अन्य सह-अभियुक्त द्वारा दायर एक अलग याचिका, SLP (क्रिमिनल) संख्या 880/2026, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष लिस्ट की गई थी।
यह भी बताया गया कि न्यायमूर्ति नागरत्ना की बेंच के समक्ष सूचीबद्ध उस संबंधित मामले में नोटिस पहले ही जारी किया जा चुका है और “आक्षेपित आदेश (impugned order) के संचालन पर रोक लगा दी गई है।”
कोर्ट की टिप्पणी और आदेश
दलीलों का संज्ञान लेते हुए, बेंच ने संबंधित मामलों को अलग-अलग कोर्ट में लिस्ट करने में हुई प्रशासनिक चूक पर गंभीरता दिखाई। कोर्ट ने पाया कि अन्य सह-अभियुक्त द्वारा दायर याचिका, जिसकी जमानत हाईकोर्ट द्वारा उसी फैसले के माध्यम से रद्द की गई थी, न्यायाधीशों के एक अलग संयोजन (different Bench) के समक्ष लिस्ट की गई थी।
नतीजतन, कोर्ट ने निर्देश दिया कि वर्तमान याचिका को भी न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष लिस्ट किया जाए, जिसके लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश से उचित आदेश प्राप्त किया जाए।
रजिस्ट्री की कार्यप्रणाली के संबंध में कड़ा निर्देश देते हुए कोर्ट ने आदेश दिया:
“रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष पूरे तथ्य रखे कि एक ही एफआईआर से उत्पन्न और हाईकोर्ट द्वारा पारित एक ही आदेश के खिलाफ, इस न्यायालय के समक्ष दायर दो याचिकाओं को अलग-अलग बेंचों के समक्ष क्यों सूचीबद्ध किया गया है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“दोषी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।”
मामले को उचित बेंच के पास स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया ताकि संबंधित अपीलों पर एकसमान निर्णय सुनिश्चित किया जा सके।
केस डिटेल:
- केस टाइटल: अर्शील @ अमान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: पेटिशन फॉर स्पेशल लीव टू अपील (क्रिमिनल) नंबर 1123/2026
- कोरम: न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर

