सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बैंकों द्वारा किसी लोन अकाउंट को ‘फ्रॉड’ (धोखाधड़ी) के रूप में वर्गीकृत करने से पहले कर्जदारों (Borrowers) को व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का अधिकार नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह अनिवार्य कर दिया है कि बैंकों को वह पूरी फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट (FAR) कर्जदार को सौंपनी होगी, जिसके आधार पर खाते को फ्रॉड घोषित करने की कार्रवाई की जा रही है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन करने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करना, साक्ष्य उपलब्ध कराना, लिखित प्रतिनिधित्व पर विचार करना और एक तर्कसंगत आदेश (Reasoned Order) पारित करना पर्याप्त है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और बैंक ऑफ इंडिया द्वारा दायर अपीलों से जुड़ा है। एसबीआई ने अमित आयरन प्राइवेट लिमिटेड के खाते को 13 मार्च, 2024 को ‘फ्रॉड’ घोषित किया था। इसी तरह, बैंक ऑफ इंडिया ने मेसर्स लिलिपुट किड्सवियर लिमिटेड के खाते को 14 मई, 2025 को फ्रॉड की श्रेणी में डाला था।
दोनों मामलों में कर्जदारों ने संबंधित हाईकोर्ट (कलकत्ता और दिल्ली) का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने कर्जदारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम राजेश अग्रवाल (2023) के फैसले की व्याख्या की और कहा कि व्यक्तिगत सुनवाई देना आवश्यक है। इसके बाद बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट में इन फैसलों को चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
आरबीआई (RBI) और अपीलकर्ता बैंकों ने तर्क दिया कि व्यक्तिगत सुनवाई प्राकृतिक न्याय का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि:
- फ्रॉड का वर्गीकरण मुख्य रूप से वित्तीय विवरणों और लेनदेन के रिकॉर्ड जैसे दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित होता है।
- व्यक्तिगत सुनवाई अनिवार्य करने से कर्जदार समय का फायदा उठाकर संपत्ति छिपा सकते हैं या फरार हो सकते हैं, जिससे फ्रॉड का पता लगाने का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
- आरबीआई के ‘मास्टर डायरेक्शंस-2024’ में पहले से ही नोटिस और लिखित जवाब का प्रावधान है, जो पर्याप्त है।
कर्जदारों की ओर से दलील दी गई कि:
- किसी खाते को ‘फ्रॉड’ घोषित करना कर्जदार के लिए “सिविल डेथ” (नागरिक मृत्यु) के समान है, क्योंकि इसके बाद उसे भविष्य में बैंकिंग सुविधाओं से वंचित कर दिया जाता है और आपराधिक कार्यवाही भी शुरू हो जाती है।
- राजेश अग्रवाल (2023) के फैसले में ‘रिप्लाई’ और ‘रिप्रजेंटेशन’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया था, जिसका अर्थ मौखिक सुनवाई भी है।
- व्यक्तिगत सुनवाई से इनकार करना अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत मौलिक अधिकारों और आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) का उल्लंघन है।
कोर्ट का विश्लेषण
पीठ ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की लचीली प्रकृति पर जोर देते हुए ए.के. करैपक बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय कोई “पत्थर की लकीर” नहीं है और इसकी व्याख्या मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
पर्सनल हियरिंग पर: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजेश अग्रवाल (2023) के फैसले में व्यक्तिगत सुनवाई का अधिकार नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा:
“हमने पहले के राजेश अग्रवाल मामले का विश्लेषण किया है और हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि कोर्ट ने कर्जदारों को व्यक्तिगत सुनवाई का अधिकार नहीं दिया था… कोर्ट का अर्थ केवल कारण बताओ नोटिस का जवाब देना और फॉरेंसिक रिपोर्ट के निष्कर्षों के खिलाफ अपना पक्ष रखना था।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“प्रशासनिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर प्राकृतिक न्याय का अस्वाभाविक विस्तार करना परेशानी भरा हो सकता है… मौखिक सुनवाई एक प्रशासनिक प्रक्रिया को लंबी खींच देगी, जो त्वरित कार्रवाई के उद्देश्य को ही खत्म कर देगा।”
ऑडिट रिपोर्ट के खुलासे पर: हालांकि, सामग्री के प्रकटीकरण (Disclosure) पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कहा कि फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट की कॉपी देना नियम है, अपवाद नहीं।
“कारण (Reasons) उन सामग्रियों और निष्कर्षों के बीच की कड़ी हैं जिन पर फैसला आधारित होता है… यदि बैंक खाते को फ्रॉड घोषित करने के लिए ऑडिट रिपोर्ट को प्रासंगिक मानते हैं, तो उसे कर्जदार को देना अनिवार्य है।”
कोर्ट ने टी. टकानो बनाम सेबी मामले का हवाला देते हुए कहा कि प्रकटीकरण से निष्पक्षता और पारदर्शिता बढ़ती है। बैंक रिपोर्ट के उन हिस्सों को छिपा (Redact) सकते हैं जो किसी तीसरे पक्ष की गोपनीयता से जुड़े हों, लेकिन ऐसा करने के लिए ठोस कारण रिकॉर्ड करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- व्यक्तिगत सुनवाई का अधिकार नहीं: कोर्ट ने हाईकोर्ट के उन निर्देशों को रद्द कर दिया जिनमें व्यक्तिगत सुनवाई अनिवार्य की गई थी। यह स्पष्ट किया गया कि आरबीआई के मास्टर डायरेक्शंस-2024 कानून के दायरे को सही ढंग से समझते हैं।
- ऑडिट रिपोर्ट देना अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट (डिजिटल रूप में भी) की कॉपी कर्जदार को देना अनिवार्य है ताकि वह अपना प्रभावी जवाब दाखिल कर सके।
- नए सिरे से विचार: कोर्ट ने अपीलकर्ता बैंकों को निर्देश दिया कि वे कर्जदारों को ऑडिट रिपोर्ट सौंपें, उनका जवाब लें और उसके बाद आरबीआई के मास्टर डायरेक्शंस के अनुसार नए सिरे से तर्कसंगत आदेश पारित करें।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम अमित आयरन प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य (सम्बद्ध मामलों के साथ)
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 4243-4244 ऑफ 2026
- पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
- दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

