सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ नगर निगम में लॉ ऑफिसर की भर्ती से जुड़े एक दिलचस्प कानूनी विवाद का निपटारा करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने निर्देश दिया है कि इस मामले के दोनों उम्मीदवारों को सेवा में समायोजित किया जाए। कोर्ट ने माना कि परीक्षा में पूछा गया संवैधानिक सवाल इतना जटिल था कि अलग-अलग न्यायिक व्याख्याओं के आधार पर एक से अधिक उत्तर सही हो सकते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत चंडीगढ़ नगर निगम द्वारा लॉ ऑफिसर के एक पद के लिए जारी विज्ञापन से हुई। चयन 100 अंकों की लिखित परीक्षा के आधार पर होना था। इस परीक्षा के प्रश्न संख्या 73 में पूछा गया था:
“संविधान की निम्नलिखित में से कौन सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त (immune) है? A) सातवीं अनुसूची B) नौवीं अनुसूची C) दसवीं अनुसूची D) उपरोक्त में से कोई नहीं”
भर्ती बोर्ड ने विकल्प ‘B’ (नौवीं अनुसूची) को सही माना। वहीं, उम्मीदवार अमित कुमार शर्मा (तीसरे प्रतिवादी) ने विकल्प ‘D’ (उपरोक्त में से कोई नहीं) को चुना था। गलत उत्तर मानकर शर्मा के अंक काट दिए गए, जिससे उनका चयन नहीं हो सका और चरण प्रीत सिंह (अपीलकर्ता) को नियुक्त कर लिया गया।
शर्मा ने इसे पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने उनकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश को पलटते हुए शर्मा के पक्ष में फैसला सुनाया। इसी फैसले के खिलाफ चरण प्रीत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
कानूनी विश्लेषण और पूर्व उदाहरण
मामले की जड़ इस सवाल पर थी कि क्या नौवीं अनुसूची आज भी न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह सुरक्षित है।
हाईकोर्ट के सिंगल जज ने अपने फैसले में ‘शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ’ (1951) और ‘सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य’ (1964) जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा था कि अनुच्छेद 31B अभी भी अस्तित्व में है, जो नौवीं अनुसूची को सुरक्षा प्रदान करता है। उनके अनुसार, भर्ती बोर्ड का विकल्प ‘B’ को सही मानना उचित था।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने ‘आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य’ (2007) मामले का संदर्भ दिया। बेंच का मानना था कि कोएल्हो जजमेंट के बाद यह कहना गलत है कि नौवीं अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह मुक्त है। इसलिए, अमित शर्मा द्वारा चुना गया विकल्प ‘D’ कानूनी रूप से सही था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि जब हाईकोर्ट के जज ही एक उत्तर पर सहमत नहीं हैं, तो कानून के छात्रों से यह उम्मीद करना कठिन है कि वे दशकों पुरानी कानूनी व्याख्याओं के आधार पर एक सटीक निष्कर्ष पर पहुंचें। बेंच ने कहा:
“एक कानून स्नातक (Law Graduate) के दृष्टिकोण से, दोनों उत्तर सही हो सकते हैं। हालांकि पूछे गए प्रश्न की भाषा को देखते हुए विकल्प ‘B’ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, लेकिन इस अदालत के पिछले फैसलों के गहन विश्लेषण पर विकल्प ‘D’ को भी सही माना जा सकता है।”
न्यायालय का अंतिम निर्णय
अदालत ने ‘विकास प्रताप सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ (2013) मामले के सिद्धांतों का पालन करते हुए दोनों उम्मीदवारों के हितों की रक्षा करने का निर्णय लिया। कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- चंडीगढ़ नगर निगम चरण प्रीत सिंह और अमित कुमार शर्मा, दोनों को पद पर समायोजित करे।
- अमित शर्मा की नियुक्ति के लिए एक ‘सुपरन्यूमेररी पोस्ट’ (अतिरिक्त पद) सृजित की जाए।
- चरण प्रीत सिंह, जो पहले से ही सेवा में हैं, उन्हें अमित शर्मा से वरिष्ठ (Senior) माना जाएगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्याख्या की अस्पष्टता के कारण किसी भी योग्य उम्मीदवार को नुकसान नहीं होना चाहिए।
मामले का विवरण:
केस टाइटल: चरण प्रीत सिंह बनाम नगर निगम चंडीगढ़ एवं अन्य
सिविल अपील संख्या: 3446/2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 16533/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा
दिनांक: 17 मार्च, 2026

