सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें 11 किलो 50 ग्राम चरस के साथ पकड़े गए एक व्यक्ति को बरी करने के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि तलाशी के दौरान पुलिस अधिकारी के सामने पेश होने का “तीसरा विकल्प” देना ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस’ (ND&PS) एक्ट, 1985 की धारा 50 के अनिवार्य प्रावधानों के विरुद्ध है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 13 मार्च 2013 का है, जब पंदराणु नामक स्थान पर नियमित ‘नाकाबंदी’ के दौरान पुलिस दल ने प्रतिवादी सूरत सिंह को रोका था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सिंह एक लाल-ग्रे रंग का बैग लेकर जा रहा था और पुलिस को देखकर भागने की कोशिश करने लगा। संदेह होने पर जब उसके बैग की तलाशी ली गई, तो उसमें से बॉल्स और स्टिक्स के रूप में 11 किलो 50 ग्राम चरस बरामद हुई।
31 दिसंबर 2014 को विशेष न्यायाधीश-I, शिमला ने सिंह को ND&PS एक्ट की धारा 20 के तहत दोषी ठहराया और 10 साल के सश्रम कारावास व 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद सिंह ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की, जिसने 8 अक्टूबर 2015 को दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया। इसी फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (हिमाचल प्रदेश राज्य): राज्य सरकार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को रद्द करने में गलती की है। सरकार का कहना था कि चरस आरोपी के बैग से बरामद हुई थी न कि उसकी व्यक्तिगत तलाशी (Personal Search) में, इसलिए यह एक ‘चांस रिकवरी’ थी। राज्य ने अब्दुल राशिद इब्राहिम मंसूरी बनाम गुजरात राज्य और पंजाब राज्य बनाम माखन सिंह के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि गवाहों के बयान बैग से बरामदगी की पुष्टि करते हैं।
प्रतिवादी (सूरत सिंह): प्रतिवादी के वकील ने दलील दी कि भले ही प्रतिबंधित सामग्री बैग में थी, लेकिन पुलिस ने आरोपी की व्यक्तिगत तलाशी भी ली थी। उन्होंने तर्क दिया कि जांच अधिकारी (IO) ने आरोपी को “तीसरा विकल्प” दिया था—कि वह स्वयं पुलिस अधिकारी द्वारा तलाशी लेने के लिए अपनी सहमति दे दे—जो ND&PS एक्ट की धारा 50 के तहत अनुमत नहीं है।
इसके अलावा, प्रतिवादी ने एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया: अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि चरस को तौलने के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक तराजू का उपयोग किया गया था, लेकिन जिस दुकानदार (PW-8) से वह तराजू लेने की बात कही गई, उसने गवाही दी कि उसके पास केवल पारंपरिक तराजू था और उस दिन कोई पुलिस अधिकारी उसके पास नहीं आया था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने दो मुख्य मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया: धारा 50 का वैधानिक पालन और जब्ती की प्रक्रिया की विश्वसनीयता।
1. धारा 50 का अनिवार्य पालन कोर्ट ने गौर किया कि यदि बैग की तलाशी के साथ-साथ व्यक्ति की भी तलाशी ली जाती है, तो धारा 50 के प्रावधान लागू होते हैं। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने आरोपी को मजिस्ट्रेट, राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) या स्वयं जांच अधिकारी के सामने तलाशी देने का विकल्प दिया था। राजस्थान राज्य बनाम परमानंद और अन्य के मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:
“ND & PS एक्ट की धारा 50 के अनुसार, आरोपी को उसके कानूनी अधिकार के बारे में बताया जाना चाहिए कि उसकी तलाशी या तो मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी के सामने ली जा सकती है। पुलिस अधिकारी के सामने तलाशी लेने का कोई तीसरा विकल्प नहीं है। इस प्रकार, आरोपी से प्राप्त सहमति अधिनियम की धारा 50 के अनुरूप नहीं थी। इसने पूरे ट्रायल को दूषित कर दिया है।”
पीठ ने सुरेश बनाम मध्य प्रदेश राज्य का भी हवाला दिया और जोर देकर कहा कि पुलिस दल द्वारा तलाशी लेने से इनकार करने के कानूनी अधिकार के बारे में व्यक्ति को “सूचित करने में विफलता” बरामदगी को संदिग्ध बनाती है। कोर्ट ने आगे टिप्पणी की:
“जांच अधिकारी द्वारा तीसरा विकल्प प्रदान करने का कार्य, अर्थात पुलिस अधिकारी की उपस्थिति में आरोपी की तलाशी लेना, अधिनियम के प्रावधानों और विशेष रूप से ND & PS एक्ट की धारा 50 के प्रावधानों के स्पष्ट रूप से विपरीत था।”
2. साक्ष्यों में विरोधाभास अदालत ने दुकानदार (PW-8) की गवाही को अभियोजन पक्ष की कहानी के लिए घातक माना। कोर्ट ने कहा:
“गवाह का यह असंदिग्ध बयान अभियोजन पक्ष की इस कहानी को झुठलाता है कि प्रतिबंधित सामग्री चरस को तौलने के लिए इलेक्ट्रॉनिक तराजू का उपयोग किया गया था। इस प्रकार, PW-8 का मौखिक साक्ष्य अभियोजन पक्ष के मामले को संदिग्ध और अविश्वसनीय बनाने का एक अतिरिक्त कारण है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के आकलन में कोई गलती नहीं की है। राज्य की अपील को “मेरिट से रहित” मानते हुए कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया और सूरत सिंह को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा।
मामले का विवरण
- केस का नाम: हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम सूरत सिंह
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 96/2018
- पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
- तारीख: 16 मार्च, 2026

