सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें शीर्ष अदालत की इमारत के गुंबद पर राष्ट्रीय प्रतीक (नेशनल एम्बलम) स्थापित करने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्तित विपुल एम. पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा अदालत के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में।
यह याचिका बदरवादा वेणुगोपाल, जिन्हें ‘बड़ा खतरनाक’ के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर अदालत से मांग की थी कि प्रतिष्ठित सुप्रीम कोर्ट भवन के ऊपर राष्ट्रीय प्रतीक लगाने के लिए न्यायिक निर्देश जारी किए जाएं।
कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने मई 2025 में मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय से संपर्क किया था। उन्हें 27 नवंबर, 2025 को जवाब मिला था कि सुप्रीम कोर्ट वर्तमान में अपने स्वयं के विशिष्ट प्रतीक (Emblem) का उपयोग करता है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने जोर देकर कहा कि न्यायिक याचिकाएं वास्तुशिल्प या प्रतीकात्मक आवश्यकताओं को संबोधित करने का सही माध्यम नहीं हैं।
याचिकाकर्ता के पिछले पत्राचार पर टिप्पणी करते हुए सीजेआई ने कहा कि नवंबर के अंत में मिला प्रशासनिक जवाब उनके कार्यकाल की शुरुआत के समय का था। सीजेआई ने कहा, “पिछला प्रशासनिक निर्णय 24 नवंबर, 2025 को मेरा कार्यकाल शुरू होने से पहले लिया गया था।” उन्होंने संकेत दिया कि इस मुद्दे पर उचित प्रशासनिक माध्यमों से फिर से विचार किया जा सकता है।
पीठ ने यह भी जानकारी दी कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के नए भवन परिसर का निर्माण कार्य चल रहा है। सीजेआई ने शुरुआत में ही कहा, “हम एक नई इमारत बना रहे हैं; हम उस समय इस पर विचार करेंगे।” इससे यह स्पष्ट हुआ कि ऐसी प्रतीकात्मक आवश्यकताओं को नए परिसर के डिजाइन और निर्माण के दौरान देखा जाएगा।
अदालत ने इस मामले में अपनी न्यायिक शक्तियों का उपयोग करने से इनकार करते हुए दोहराया कि याचिकाकर्ता को मुकदमेबाजी के बजाय प्रशासनिक स्तर पर पत्राचार करना चाहिए था।
सीजेआई ने याचिकाकर्ता से कहा, “आप इस मुद्दे पर याचिका दायर करने के बजाय मुझे प्रशासनिक पक्ष पर लिख सकते थे। हम देखेंगे कि क्या किया जाना है। कृपया न्यायिक पक्ष पर याचिकाएं दायर न करें।”
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के महासचिव को निर्देश दिया कि वे “सक्षम प्राधिकारी (सीजेआई) के समक्ष एक उपयुक्त नोट प्रस्तुत करें” ताकि इस मामले की प्रशासनिक स्तर पर जांच की जा सके।

