ट्रेनिंग के दौरान दिव्यांग हुए सैन्य कैडेटों को ‘पूर्व सैनिक’ का दर्जा देने पर विचार करे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या उन सैन्य कैडेटों को ‘पूर्व सैनिक’ (एक्स-सर्विसेमैन) का दर्जा दिया जा सकता है, जो प्रशिक्षण के दौरान लगी चोटों या दिव्यांगता के कारण सेना से बाहर (बोर्डेड आउट) हो जाते हैं। यदि उन्हें यह दर्जा मिलता है, तो ये युवा सरकारी और अर्ध-सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ उठा सकेंगे, जिससे उनके भविष्य को एक सुरक्षित आधार मिल सकेगा।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इनमें से अधिकांश कैडेट 20 से 30 वर्ष की आयु के बीच के होते हैं। सेना से मेडिकल आधार पर बाहर होने के बाद उन्हें रोजगार की सख्त जरूरत होती है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उन कैडेटों की समस्याओं पर लिए गए एक सुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) मामले की सुनवाई के दौरान की, जिन्हें नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) और इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से दिव्यांगता के कारण हटना पड़ा।

सुनवाई के दौरान बेंच ने प्रशिक्षुओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जो युवा देश सेवा के लिए कठिन प्रशिक्षण का हिस्सा बनते हैं और इस दौरान गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।

बेंच ने कहा, “सबमिशन के दौरान, चर्चा किए गए पहलुओं में से एक यह था कि क्या बोर्डेड-आउट कैडेटों को भी विभिन्न सरकारी और अर्ध-सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ देने के उद्देश्य से पूर्व सैनिकों या पूर्व सैन्य कर्मियों के रूप में माना जा सकता है।”

कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमन को इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने के लिए कहा ताकि ‘पूर्व सैन्य कर्मियों’ के दायरे में इन कैडेटों को भी शामिल किया जा सके। ASG ने केंद्र की ओर से आश्वासन दिया कि वे इस विषय पर एक व्यापक जवाब पेश करेंगे।

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यह मामला उन मीडिया रिपोर्ट्स के बाद सामने आया था, जिनमें बताया गया था कि 1985 से अब तक लगभग 500 कैडेट ट्रेनिंग के दौरान लगी चोटों की वजह से मेडिकल आधार पर बाहर किए जा चुके हैं। ये कैडेट भारी मेडिकल खर्च और बहुत कम मासिक अनुग्रह राशि (ex-gratia) के सहारे जीवन यापन करने को मजबूर हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि वह रक्षा बलों में ऐसे “जांबाज कैडेट” देखना चाहता है जो ट्रेनिंग के जोखिमों से न डरें। इसके लिए कोर्ट ने निम्नलिखित कदम उठाने का सुझाव दिया है:

  • बीमा सुरक्षा: कैडेटों के लिए ग्रुप इंश्योरेंस जैसी बीमा कवर की संभावना तलाशी जाए, ताकि मृत्यु या दिव्यांगता की स्थिति में उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिल सके।
  • वित्तीय सहायता में वृद्धि: वर्तमान में दिव्यांग कैडेटों को मिलने वाली ₹40,000 की एकमुश्त राशि को बढ़ाने पर विचार किया जाए।
  • ECHS का लाभ: कोर्ट को बताया गया कि रक्षा मंत्रालय ने इन कैडेटों को ‘पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना’ (ECHS) का लाभ देने की फाइल पास कर दी है, लेकिन इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
  • वैकल्पिक रोजगार: कोर्ट ने केंद्र से कैडेटों के इलाज के बाद उन्हें डेस्क जॉब या रक्षा सेवाओं से जुड़े अन्य कार्यों में पुनर्वासित करने के लिए एक योजना बनाने को कहा।
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सुप्रीम कोर्ट ने 12 अगस्त, 2023 को इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सैन्य प्रशिक्षण की कठोर प्रकृति को देखते हुए एक मजबूत सहायता तंत्र होना अनिवार्य है, ताकि देश की रक्षा के लिए अपने स्वास्थ्य का त्याग करने वाले युवाओं को भविष्य में मुश्किलों का सामना न करना पड़े।

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