सुप्रीम कोर्ट ने शादी बचाने के लिए हत्या के प्रयास का केस रद्द किया; पति ने पत्नी और बच्चे की देखभाल का दिया वचन

“जब किसी कानूनी समाधान से पत्नी और बच्चे का कल्याण सुनिश्चित होता है, तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखना हमेशा न्याय के हित में नहीं होता।” इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) के मामले को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए परिवार की स्थिरता को प्राथमिकता दी।

सुप्रीम कोर्ट उस अपील पर सुनवाई कर रहा था जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 323, 324, 452, 504 और 506 के तहत दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी। कोर्ट ने माना कि मुकदमे को बंद करना जिम्मेदारी और स्थिरता को प्रोत्साहित करके व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों हितों की पूर्ति करेगा।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता भरत पठानिया ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (शिमला) के 23 जुलाई, 2025 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने मंडी जिले के धर्मपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 93/2024 से उत्पन्न कार्यवाही को रद्द करने से मना कर दिया था। इस एफआईआर में धारा 307 जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे, साथ ही चोट पहुंचाने, घर में जबरन घुसने और आपराधिक धमकी देने के आरोप भी शामिल थे।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन उसने वैवाहिक विवाद की विशिष्ट परिस्थितियों के साथ दंडात्मक कार्रवाई (Deterrence) की आवश्यकता को संतुलित किया।

पीठ ने महत्वपूर्ण अवलोकन करते हुए कहा:

“हम इस बात से अवगत हैं कि किसी अपराध के होने से व्यापक सामाजिक प्रभाव पड़ते हैं और इसके लिए दंडात्मक प्रतिक्रिया की आवश्यकता होती है। हालांकि, न्यायिक विवेक का प्रयोग मामले की परिस्थितियों से निर्देशित होना चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा कि जहां समझौता परिवार की भलाई सुनिश्चित करता है, वहां कानूनी कठोरता को न्याय के लिए रास्ता देना चाहिए:

“जहां एक वैध समाधान पत्नी और बच्चे का कल्याण सुनिश्चित करता है, वहां आपराधिक कार्यवाही जारी रखना हमेशा न्याय के उद्देश्यों को आगे नहीं बढ़ाता है। ऐसे मामलों में, कार्यवाही को बंद करना जिम्मेदारी और स्थिरता को प्रोत्साहित करके व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों हितों की पूर्ति कर सकता है।”

फैसला

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अपीलकर्ता अपनी पत्नी के साथ कोर्ट में उपस्थित हुआ और उसने एक लिखित वचन (Undertaking) प्रस्तुत किया, जिसे प्रदर्श ‘X’ (Exhibit ‘X’) के रूप में रिकॉर्ड पर लिया गया। इस वचन में, उसने अदालत को आश्वासन दिया कि वह अपनी पत्नी और बच्चे की “अच्छे से” (Nicely) देखभाल करेगा और “उन्हें किसी भी तरह से नुकसान नहीं पहुंचाएगा”।

इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए, पीठ ने अपीलकर्ता के साथ बातचीत की और उसे वचन का उल्लंघन करने के परिणामों के बारे में समझाया। कोर्ट ने चेतावनी दी:

“हम स्पष्ट करते हैं कि यदि भविष्य में अपीलकर्ता द्वारा वचन का सम्मान करने में कोई लापरवाही/चूक/उल्लंघन होता है और इसे उसकी पत्नी या उनके बच्चे या पत्नी के किसी रिश्तेदार द्वारा इस न्यायालय के संज्ञान में लाया जाता है, तो इसके परिणाम अपीलकर्ता के लिए सुखद नहीं होंगे।”

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण न्याय करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का आह्वान करते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि “इस आदेश को भविष्य के मामलों में एक नजीर (Precedent) के रूप में उद्धृत नहीं किया जाएगा।”

केस का विवरण

  • केस टाइटल: भरत पठानिया बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl.) No. 12798/2025 से उद्भूत)
  • कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री सुकुमार पजोशी (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री मोहन लाल शर्मा (AOR), श्री जीवन लाल शर्मा, सुश्री शिखा शर्मा, सुश्री रैना आनंद
  • प्रतिवादी के वकील: श्री सत्यजीत सरना, सुश्री अनिंदिता मित्रा (AOR), श्री रक्षित राठी, डॉ. श्रीमती विपिन गुप्ता (AOR), श्री कृष्ण कुमार, सुश्री नंदनी गुप्ता

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