अनिवार्य निषेधाज्ञा की डिक्री का क्रियान्वयन तीन साल के भीतर आवश्यक; सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था में स्पष्ट किया है कि अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की डिक्री को लागू करने के लिए समय सीमा सीमित है। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें समय सीमा बीत जाने के कारण डिक्री के निष्पादन (Execution) आवेदन को खारिज कर दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि परिसीमा अधिनियम (Limitation Act), 1963 की अनुसूची के अनुच्छेद 135 के तहत, यदि डिक्री में प्रदर्शन की कोई तिथि तय नहीं है, तो इसे लागू करने की अवधि डिक्री की तारीख से तीन वर्ष ही होती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद बाबू सिंह (मृतक, कानूनी वारिसों के माध्यम से) और जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट के बीच एक प्लॉट के आवंटन को लेकर शुरू हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में याचिकाकर्ताओं के मुकदमे को खारिज कर दिया था। हालांकि, प्रथम अपील में, अपीलीय अदालत ने 6 जनवरी 2005 को अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को उलट दिया और याचिकाकर्ताओं के पक्ष में डिक्री पारित की।

प्रथम अपीलीय अदालत ने अपने फैसले में कहा था:

“मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद, मेरा मानना है कि उत्तरदाताओं द्वारा 29.07.93 के पत्र के अनुसार प्लॉट नंबर 30 और प्लॉट नंबर 31 के कुछ हिस्से का आवंटन रद्द करना अवैध, गलत और असंवैधानिक है, जो वादियों पर बाध्यकारी नहीं है।”

अदालत ने आगे एक अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) जारी की थी जिसमें उत्तरदाताओं को 18 फरवरी 1988 के आदेश का पालन करने का निर्देश दिया गया था। इसके साथ ही, अदालत ने उत्तरदाताओं को निर्माण का मुआवजा दिए जाने तक कब्जे में हस्तक्षेप करने से भी रोक दिया था।

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निष्पादन कार्यवाही और परिसीमा (Limitation)

डिक्री पारित होने के पांच साल से अधिक समय बाद, 12 अगस्त 2010 को याचिकाकर्ताओं ने डिक्री के अनिवार्य निषेधाज्ञा वाले हिस्से को लागू करने के लिए एक निष्पादन आवेदन (Execution Application) दायर किया।

8 जनवरी 2014 को निष्पादन न्यायालय ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा के बाहर है। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी 20 सितंबर 2022 को इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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न्यायालय का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने परिसीमा अधिनियम, 1963 की अनुसूची के अनुच्छेद 135 के प्रावधानों का बारीकी से परीक्षण किया। यह अनुच्छेद अनिवार्य निषेधाज्ञा की डिक्री के प्रवर्तन के लिए समय सीमा निर्धारित करता है।

पीठ ने अवलोकन किया:

“इसमें प्रदान की गई परिसीमा अवधि तीन वर्ष है जो डिक्री की तारीख से शुरू होती है या जहां प्रदर्शन के लिए कोई तारीख तय की गई है, उस तारीख से शुरू होती है।”

मौजूदा मामले में, पीठ ने पाया कि प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा 6 जनवरी 2005 को पारित डिक्री में कार्य पूरा करने या प्रदर्शन के लिए कोई विशेष तारीख तय नहीं की गई थी। ऐसी स्थिति में, कानूनन तीन साल की समय सीमा डिक्री की तारीख से ही शुरू हो गई थी।

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न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं पाया और स्पष्ट किया कि चूंकि आवेदन केवल अनिवार्य निषेधाज्ञा को लागू करने तक सीमित था, इसलिए यह समय-बाधित था।

अदालत ने कहा:

“चूंकि प्रथम अपीलीय अदालत द्वारा पारित डिक्री में प्रदर्शन के लिए किसी तारीख का उल्लेख नहीं किया गया था, इसलिए परिसीमा अवधि डिक्री की तारीख से शुरू होगी, जैसा कि निष्पादन न्यायालय ने माना था। ऐसी परिस्थितियों में, हमें विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं दिखता क्योंकि निष्पादन आवेदन डिक्री के अनिवार्य निषेधाज्ञा वाले हिस्से के प्रवर्तन तक ही सीमित था।”

परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • मामले का नाम: बाबू सिंह (मृतक) कानूनी वारिसों के माध्यम से व अन्य बनाम जालंधर इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट व अन्य
  • केस संख्या: एसएलपी (सी) संख्या 4284/2023

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