सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों के निर्माण, भंडारण और बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने से इनकार कर दिया। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भूयान की पीठ ने स्पष्ट किया कि खतरनाक स्तर की वायु प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए यह प्रतिबंध आवश्यक है। अदालत ने खास तौर पर सड़क पर काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा का ज़िक्र किया, जो वायु प्रदूषण के सबसे अधिक शिकार होते हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्वास्थ्य’ और ‘प्रदूषण रहित पर्यावरण’ को मौलिक अधिकार बताया। “स्वच्छ वातावरण में जीने का अधिकार कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है,” अदालत ने कहा, साथ ही यह भी जोड़ा कि पिछले छह महीनों में दिल्ली की वायु गुणवत्ता बेहद खराब दर्ज की गई है।
सुनवाई का मुख्य विषय “ग्रीन पटाखों” के इस्तेमाल को लेकर था, जिन्हें पर्यावरण पर कम प्रभाव डालने वाले पटाखों के रूप में प्रचारित किया गया है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि ये ग्रीन पटाखे प्रदूषण में न्यूनतम योगदान करते हैं, तब तक प्रतिबंध में ढील देने का कोई आधार नहीं है।

इस मामले में न्याय मित्र के रूप में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया कि एनसीआर के सभी चार राज्यों ने पटाखों पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगाया है, लेकिन उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में ऑनलाइन बिक्री अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अदालत ने पटाखों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण पर भी चिंता जताई, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव और गंभीर हो जाता है।
यह मुद्दा तब सामने आया जब पटाखा निर्माता अदालत पहुंचे और ग्रीन पटाखों की बिक्री की अनुमति मांगी। हालांकि, कोर्ट ने सख्त रुख बरकरार रखते हुए निर्माताओं को संविधान के अनुच्छेद 51ए के तहत अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को समझने और प्रतिबंध को चुनौती देने से बचने की सलाह दी। कोर्ट ने कहा कि एनसीआर में यह प्रतिबंध सख्ती से लागू रहेगा।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकारों को निर्देश दिया था कि वे भी दिल्ली की तर्ज पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करें, जिसमें ऑनलाइन बिक्री पर रोक भी शामिल है। अदालत ने दोहराया, “यह प्रतिबंध तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक कि पूरे एनसीआर क्षेत्र में समान रूप से सख्त उपाय नहीं किए जाते।”