कानूनी कमियों को भरने के लिए अतिरिक्त साक्ष्य का सहारा नहीं लिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवाद में अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने ग्वालियर के मोरार छावनी (Cantonment) क्षेत्र में स्थित भूमि पर निजी व्यक्तियों के मालिकाना हक के दावे को खारिज कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले की पुष्टि की, जिसने निजी पक्षकारों के पक्ष में दी गई डिक्री को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि स्वामित्व का प्राथमिक दावा ही दोषपूर्ण है, तो अपील के चरण में अतिरिक्त साक्ष्य (Additional Evidence) पेश करके उन कानूनी कमियों को नहीं भरा जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ग्वालियर के पटवारी हल्का नंबर 51, मोरार में स्थित सर्वे नंबर 2029 की 8 बीघा और 10 बिस्वा जमीन से संबंधित है। अपीलकर्ताओं (वादी) ने 1989 में केंद्र सरकार के खिलाफ घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा का मुकदमा दायर किया था। उनका दावा था कि यह जमीन उनकी पैतृक संपत्ति है और पिछले 50 वर्षों से उनके पूर्वज इस पर काबिज हैं।

ट्रायल कोर्ट ने 1996 में वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से 1984 की एक पूर्व डिक्री पर भरोसा किया था, जो वादियों के पूर्वजों ने मध्य प्रदेश राज्य के खिलाफ हासिल की थी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने पाया कि केंद्र सरकार को 1984 के मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया था, इसलिए वह डिक्री केंद्र पर बाध्यकारी नहीं थी। इस बीच, वादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XLI नियम 27 के तहत जनरल लैंड रजिस्टर (GLR) की प्रतियां अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति मांगी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री अनुपम लाल दास ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने अतिरिक्त साक्ष्य के आवेदन पर फैसला किए बिना ही मुख्य अपील पर निर्णय सुनाकर कानूनी भूल की है। उन्होंने कहा कि उनके पूर्वजों ने पहले ही राज्य के खिलाफ स्वामित्व की डिक्री हासिल कर ली थी और लंबे समय तक कब्जे के कारण उन्होंने ‘प्रतिकूल कब्जे’ (Adverse Possession) के माध्यम से मालिकाना हक प्राप्त कर लिया है।

केंद्र सरकार (प्रतिवादी) की ओर से: वरिष्ठ वकील श्री वी. चितांबरेश ने दलील दी कि मोरार छावनी की यह जमीन 1953 में राज्य सरकार से केंद्र सरकार को हस्तांतरित होने के बाद केंद्र में निहित हो गई थी। उन्होंने कहा कि 1984 की डिक्री केंद्र सरकार की अनुपस्थिति में ली गई थी, इसलिए वह शून्य है। साथ ही, अतिरिक्त साक्ष्य का आवेदन नियम 27 की शर्तों को पूरा नहीं करता था।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विश्लेषण में दो प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया:

1. आदेश XLI नियम 27 CPC (अतिरिक्त साक्ष्य) पर: कोर्ट ने कहा कि अपील के दौरान अतिरिक्त साक्ष्य पेश करना पक्षकारों का अधिकार नहीं है। यूनियन ऑफ इंडिया बनाम इब्राहिम उद्दीन (2012) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

“नियम 27 स्पष्ट करता है कि अपील के पक्षकार अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने के हकदार नहीं हैं, सिवाय उन परिस्थितियों के जिनका इसमें स्पष्ट उल्लेख है।”

कोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त साक्ष्य केवल तभी स्वीकार किया जा सकता है जब वह किसी ऐसी कमी (lacuna) को दूर करने के लिए आवश्यक हो जो कोर्ट को निर्णय लेने से रोक रही हो। इसे किसी पक्षकार की अपनी मर्जी से केस सुधारने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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2. दावे की वैधता और आचरण पर: कोर्ट ने वादियों के दावे को “बुनियादी रूप से दोषपूर्ण” पाया क्योंकि 1984 की डिक्री केंद्र सरकार (असली मालिक) को पक्षकार बनाए बिना ली गई थी। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:

“असली मालिक की पीठ पीछे डिक्री हासिल करने के प्रयास को हल्के में नहीं लिया जा सकता।”

पीठ ने यह भी नोट किया कि प्रथम अपीलकर्ता (गोविंद सिंह) उस समय कमिश्नर कार्यालय में कार्यरत थे और जिस तेजी से एकतरफा डिक्री के बाद राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव किए गए, वह कार्यवाही की ईमानदारी (bona fides) पर सवाल उठाता है।

3. प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) पर: कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कर्ष को दोहराते हुए कहा:

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“राज्य या केंद्र सरकार के खिलाफ प्रतिकूल कब्जे के आधार पर अधिकारों का सृजन नहीं हो सकता, चाहे कब्जा कितना भी लंबा क्यों न हो।”

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यदि अतिरिक्त साक्ष्य (GLR प्रविष्टियां) स्वीकार कर भी ली जातीं, तो भी फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वादी स्वतंत्र रूप से अपना स्वामित्व साबित करने में विफल रहे। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल खत्म होने के बाद अपील के स्तर पर वादी अपने केस की बुनियादी खामियों को छिपाने के लिए नई सामग्री पेश करने की अनुमति नहीं पा सकते।

इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2009 और 2011 के आदेशों को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: गोबिंद सिंह और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 5168-5169 / 2011
  • पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता
  • दिनांक: 09 मार्च, 2026

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