सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ ने शनिवार को कहा कि जहां अब तक उनकी पहचान मुख्य रूप से कानूनी बिरादरी तक सीमित थी, वहीं चर्चित स्ट्रे डॉग्स (आवारा कुत्तों) मामले ने उन्हें “न केवल इस देश में बल्कि पूरी दुनिया में” पहचान दिलाई है।
केरल में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर आयोजित एक सम्मेलन में बोलते हुए जस्टिस नाथ ने इस मामले को सौंपने के लिए मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “अब तक मैं कानूनी बिरादरी में अपने थोड़े-बहुत काम के लिए जाना जाता था, लेकिन स्ट्रे डॉग्स (मामले) का आभारी हूं कि इसने मुझे पूरे सिविल सोसाइटी में… और इस देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में पहचान दिलाई। मैं अपने CJI का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे यह मामला सौंपा।”
नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) और केरल स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (KeLSA) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई न्यायाधीश मौजूद थे। जस्टिस नाथ ने बताया कि हाल ही में वकीलों के एक कार्यक्रम में, कई एसोसिएशन अध्यक्षों ने उनसे इस मामले के बारे में पूछा, और मजाक में कहा कि अब उन्हें न केवल डॉग लवर्स बल्कि कुत्तों से भी “आशीर्वाद और शुभकामनाएं” मिल रही हैं।

उन्होंने न्यायपालिका द्वारा पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन पर जोर देते हुए कहा, “प्राकृतिक संसाधन राज्य की संपत्ति नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किए जाने वाला एक ट्रस्ट हैं।”
स्ट्रे डॉग्स का मुद्दा तब सुर्खियों में आया जब 11 अगस्त को जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की पीठ ने दिल्ली के नगर निगम अधिकारियों को आठ सप्ताह के भीतर सभी इलाकों से आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखने का निर्देश दिया था। पशु अधिकार संगठनों के विरोध के बाद यह मामला जस्टिस नाथ की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा गया।
22 अगस्त को जस्टिस नाथ, संदीप मेहता और एन. वी. अंजारिया की पीठ ने पहले के आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि कुत्तों को डिवार्मिंग और टीकाकरण के बाद शेल्टर से छोड़ दिया जाए।