सर्विस चार्ज वसूली वाद में तीसरा पक्ष ‘आवश्यक या उचित’ नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकार बनने की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एनएके (NAK) इंजीनियरिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने बॉम्बे हाइकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कंपनी को सर्विस चार्ज वसूली के मुकदमे में पक्षकार (Party) बनाने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता इस मुकदमे में न तो ‘आवश्यक’ (Necessary) पक्ष है और न ही ‘उचित’ (Proper) पक्ष।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि वादी (Plaintiff) मुकदमे का स्वामी (Dominus Litis) होता है और उसे किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिससे वह कोई राहत नहीं मांग रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मुंबई के चर्चगेट हाउस स्थित एक वाणिज्यिक परिसर से जुड़ा है, जिसके मूल मालिक केसरीचंद शाह थे। इस परिसर को मेसर्स मॉडर्न प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को किराए पर दिया गया था, जिसने बाद में 525 वर्ग फुट का क्षेत्र प्रतिवादी संख्या 3 (मेसर्स किशोर इंजीनियरिंग कंपनी) को सबलेट (किराये पर) कर दिया। किराए के अलावा, प्रतिवादी संख्या 3 को फर्नीचर और फिक्स्चर के उपयोग के लिए 2,100 रुपये प्रति माह सर्विस चार्ज देना था।

केसरीचंद शाह की मृत्यु के बाद, उनके वारिसों (प्रतिवादी संख्या 1 और 2) ने नवंबर 2004 से अक्टूबर 2007 की अवधि के लिए 75,600 रुपये के बकाया सर्विस चार्ज की वसूली के लिए बॉम्बे सिटी सिविल कोर्ट में वाद संख्या 6117/2007 दायर किया।

चूंकि प्रतिवादी संख्या 3 कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ, इसलिए मुकदमा एकतरफा (ex-parte) आगे बढ़ा। इसके बाद, 2 अप्रैल 2018 को एनएके इंजीनियरिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (अपीलकर्ता) ने खुद को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने के लिए एक नोटिस ऑफ मोशन दायर किया। अपीलकर्ता ने दावा किया कि वह कंपनी अधिनियम, 1956 के भाग IX के तहत प्रतिवादी संख्या 3 का उत्तराधिकारी (Successor) है और वर्तमान में परिसर पर उसका कब्जा है और वह व्यवसाय चला रहा है।

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निचली अदालत ने 5 अक्टूबर 2018 के आदेश के तहत इस मांग को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, बॉम्बे हाइकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए 21 फरवरी 2022 को इस आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि अपीलकर्ता एक आवश्यक पक्ष नहीं है। इसके खिलाफ एनएके इंजीनियरिंग ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता का पक्ष: अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री चंदर उदय सिंह ने तर्क दिया कि हाइकोर्ट ने एक इंटरलोक्यूटरी आदेश में हस्तक्षेप करके अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र (supervisory jurisdiction) का उल्लंघन किया है। उनका कहना था कि अपीलकर्ता प्रतिवादी संख्या 3 का उत्तराधिकारी है और 1991 से सर्विस चार्ज का भुगतान कर रहा है और फर्नीचर का उपयोग कर रहा है। उन्होंने दलील दी कि प्रतिवादी संख्या 3 के खिलाफ पारित कोई भी डिक्री अंततः अपीलकर्ता के खिलाफ ही निष्पादित होगी, इसलिए उन्हें पक्षकार बनाना आवश्यक है।

प्रतिवादी का पक्ष: प्रतिवादी संख्या 1 के वकील डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता स्वच्छ हाथों (Clean Hands) से कोर्ट नहीं आया है। उन्होंने बताया कि 2008 में प्रतिवादी संख्या 3 को भेजे गए समन पर अपीलकर्ता की मुहर लगी थी, जिससे साबित होता है कि उन्हें मुकदमे की जानकारी 9 साल पहले ही थी। प्रतिवादियों ने कहा कि वे Dominus Litis हैं और उन्होंने पैसे की वसूली के इस विशिष्ट मुकदमे में अपीलकर्ता के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी है। इसके अलावा, अपीलकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि वह कानूनी रूप से प्रतिवादी संख्या 3 का उत्तराधिकारी है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत यह जांच की कि क्या अपीलकर्ता “आवश्यक” या “उचित” पक्ष की श्रेणी में आता है।

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1. आवश्यक और उचित पक्ष के बीच अंतर रमेश हीराचंद कुंदनमल बनाम म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ ग्रेटर बॉम्बे (1992) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“एक आवश्यक पक्ष वह है जिसके बिना कोई भी आदेश प्रभावी रूप से नहीं दिया जा सकता। एक उचित पक्ष वह है जिसकी अनुपस्थिति में एक प्रभावी आदेश तो दिया जा सकता है, लेकिन कार्यवाही में शामिल प्रश्न पर पूर्ण और अंतिम निर्णय के लिए उसकी उपस्थिति आवश्यक है।”

2. ‘डोमिनस लिटिस’ (Dominus Litis) का सिद्धांत कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वादी (प्रतिवादी संख्या 1 और 2) ने केवल प्रतिवादी संख्या 3 से पैसे की वसूली मांगी है। कनकलता दास बनाम नबा कुमार दास (2018) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

“…वादी डोमिनस लिटिस होने के नाते उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी तीसरे व्यक्ति को मुकदमे में पक्ष बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता… जब तक कि वह व्यक्ति यह साबित करने में सक्षम न हो कि वह एक आवश्यक पक्ष है।”

3. उत्तराधिकार साबित करने में विफलता कोर्ट ने नोट किया कि प्रतिवादी संख्या 3 चार भागीदारों वाली एक साझेदारी फर्म थी और इसे कंपनी अधिनियम, 1956 के भाग IX के तहत कंपनी में परिवर्तित नहीं किया जा सकता था, जिसके लिए कम से कम सात सदस्यों की आवश्यकता होती है। कोर्ट ने कहा:

“अपीलकर्ता ने प्रतिवादी संख्या 3 का उत्तराधिकारी होने का दावा करने के अलावा मुकदमे में शामिल होने के लिए अपना कोई स्वतंत्र अधिकार स्थापित नहीं किया है, जो हमारी राय में आधारहीन है।”

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4. देरी और आचरण फैसले में अपीलकर्ता द्वारा देरी पर भी प्रकाश डाला गया। कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता को 2008 में मुकदमे की जानकारी थी, लेकिन उसने गवाही बंद होने के बाद 2018 में पक्षकार बनने के लिए आवेदन किया।

“इम्पलीडमेंट (Impleadment) आवेदन मुकदमे की जानकारी के लगभग नौ साल बाद दायर किया गया था। इस प्रकार, हाइकोर्ट ने सही ही अपीलकर्ता को शामिल करने से इनकार किया है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए हाइकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि वह मुकदमे में पक्ष नहीं है, इसलिए इस मुकदमे में पारित डिक्री का उपयोग उसके खिलाफ नहीं किया जाएगा और न ही इसे उसके खिलाफ लागू किया जाएगा।

केस विवरण

  • केस टाइटल: एनएके इंजीनियरिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड बनाम तरुण केसरीचंद शाह और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 6024-6025 / 2022 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले

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