सुप्रीम कोर्ट ने HUDA की सोसाइटी में ‘भाई-भतीजावाद’ पर जताई कड़ी नाराजगी; अवैध फ्लैट आवंटन रद्द कर अधिकारियों पर लगाया भारी जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HUDA) के कर्मचारियों की हाउसिंग सोसाइटी (HEWO) द्वारा किए गए दो ‘सुपर डीलक्स’ फ्लैटों के आवंटन को “धोखाधड़ी” और “स्व-प्रशंसा का शर्मनाक प्रदर्शन” बताते हुए रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पाया कि सोसाइटी के गवर्निंग बॉडी सदस्य और उनके अधीनस्थ कर्मचारी को किए गए ये आवंटन पूरी तरह से मनमाने, पक्षपाती और पात्रता नियमों के उल्लंघन में थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद ‘हुडा, अर्बन एस्टेट एंड टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एम्प्लॉइज वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन’ (HEWO) द्वारा निर्मित अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में दो फ्लैटों के आवंटन से संबंधित है। यह संस्था सरकारी कर्मचारियों को पारदर्शी तरीके से आवास सुविधा प्रदान करने के लिए बनाई गई थी। अपीलकर्ता दिनेश कुमार, जो हुडा में 14 वर्षों से कार्यरत हैं, ने प्रतिवादी संख्या 3 (एक गवर्निंग बॉडी सदस्य) और प्रतिवादी संख्या 4 (उसी सदस्य के अधीन कार्यरत एक अकाउंटेंट) को दिए गए फ्लैटों को चुनौती दी थी।

दिनेश कुमार का आरोप था कि ये दोनों व्यक्ति आवंटन के पात्र नहीं थे और सोसाइटी ने अपनों को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया। हालांकि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य माना था, लेकिन योग्यता के आधार पर इसे खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि कुमार चूंकि ड्रॉ (Draw of Lots) में शामिल हुए थे, इसलिए अब वे इसे चुनौती नहीं दे सकते।

पक्षों के तर्क

प्रतिवादियों का तर्क था कि HEWO एक निजी संस्था है और संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ की परिभाषा में नहीं आती, इसलिए इस पर रिट अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता। उन्होंने यह भी दलील दी कि गवर्निंग बॉडी के फैसलों के अनुसार पुराने सदस्यों को प्राथमिकता देना एक सामान्य प्रक्रिया रही है। वहीं, अपीलकर्ता के वकील प्रदीप दहिया ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने तथ्यों को गहराई से देखे बिना ही याचिका खारिज कर दी, जबकि मामले में स्पष्ट रूप से शक्तियों का दुरुपयोग और पक्षपात दिखाई दे रहा था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष पर मुहर लगाई कि यह सोसाइटी अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में आती है, क्योंकि इसके सदस्य सरकारी कर्मचारी हैं और जमीन सरकार द्वारा आवंटित की गई थी। फैसले में पीठ ने कहा:

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“भाई-भतीजावाद और स्व-प्रशंसा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिशाप हैं, विशेषकर तब जब यह सरकारी सेवा के सदस्यों वाली किसी सोसाइटी में होता है… गवर्निंग बॉडी के सदस्यों को निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक विश्वसनीय (Fiduciary) क्षमता में कार्य करना चाहिए।”

प्रतिवादी संख्या 3 का आवंटन

कोर्ट ने पाया कि आवेदन की अंतिम तिथि (18 जून, 2021) तक प्रतिवादी संख्या 3 न तो हुडा के कर्मचारी थे और न ही HEWO के सदस्य। उन्होंने 12 अगस्त, 2021 को कार्यभार संभाला और जल्दबाजी में उन्हें सरेंडर किया गया एक फ्लैट दे दिया गया। कोर्ट ने इस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि प्रतिवादी संख्या 3 ने अपने आधिकारिक पद का इस्तेमाल कर खुद को ही (व्यक्तिगत क्षमता में) आवंटन पत्र जारी किया, जो एक “तमाशा” मात्र था। उनके पास सदस्यता के लिए अनिवार्य छह महीने की सेवा का अनुभव भी नहीं था।

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प्रतिवादी संख्या 4 का आवंटन

प्रतिवादी संख्या 4 के मामले में कोर्ट ने पाया कि वे निर्धारित ‘पे-बैंड लेवल’ (लेवल 10 से 20) की श्रेणी में नहीं आते थे। सोसाइटी ने बाद में एक नियम बनाकर उनके अवैध आवंटन को ‘नियमित’ करने की कोशिश की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी संख्या 3 के हुडा में आने से न केवल उन्होंने खुद के लिए फायदा उठाया, बल्कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी को भी अवैध रूप से फ्लैट दिलवाने में मदद की।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया और निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. जुर्माना: कोर्ट ने HEWO (प्रतिवादी 2) पर 1 लाख रुपये, प्रतिवादी 3 पर 50,000 रुपये और प्रतिवादी 4 पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही, सोसाइटी को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को कानूनी खर्च के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करे।
  2. फ्लैट खाली करने का आदेश: प्रतिवादियों द्वारा जमा की गई राशि बिना ब्याज के वापस की जाएगी और उन्हें रिफंड मिलने के एक महीने के भीतर फ्लैट खाली करना होगा।
  3. नया ड्रॉ: सोसाइटी को निर्देश दिया गया है कि वह मूल रूप से पात्र पाए गए चार आवेदकों के बीच फिर से पारदर्शी तरीके से ड्रॉ आयोजित करे। यदि केवल अपीलकर्ता ही पात्र बचते हैं, तो एक फ्लैट उन्हें आवंटित किया जाएगा।
  4. वसूली: कोर्ट ने सोसाइटी को छूट दी है कि वह उस पर लगाया गया जुर्माना उन गवर्निंग बॉडी सदस्यों से वसूल सकती है जिन्होंने इस अवैध आवंटन का निर्णय लिया था।
  • केस का शीर्षक: दिनेश कुमार बनाम हरियाणा राज्य और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (@SLP (C) संख्या 16057/2025)

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